Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
स्थिरतया सुखभासितया तया सततमुज्ज्ञितमुत्तमफल्गु च ।
जगति नास्ति तथा गुणवर्जितं मरणभाजनमायुरिदं यथा ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनिवर, अधिक क्या कहें, जीवन्मुक्त पुरुषों द्वारा अनुभूत नित्य सुख और
स्थिरता से सर्वदा के लिए त्यक्त, अति तुच्छ और गुणों से रहित संसार में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जैसी
कि मृत्यु की ग्रास यह आयु है