Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verses 4–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, verses 4–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 4-6
संस्कृत श्लोक
वयं परिमिताकारपरिनिष्ठितनिश्चयाः ।
संसाराभ्रतडित्पुञ्जे मुने नायुषि निर्वृताः ॥ ४ ॥
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्य च खण्डनम् ।
ग्रथनं च तरङ्गाणामास्था नायुषि युज्यते ॥ ५ ॥
पेलवं शरदीवाभ्रमस्नेह इव दीपकः ।
तरङ्गक इवालोलं गतमेवोपलक्ष्यते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
हे महामुने, हम लोग देह आदि को ही “यह आत्मा है", ऐसा निश्चय कर बैठे हैं, हमें संसाररूपी
मेघ में स्थित बिजली के समान चंचल आयु में सुख प्राप्त नहीं हुआ । वायु का घेरा हो सकता है,
आकाश के टुकड़े टुकड़े किये जा सकते हैं और लहरें एक दूसरे में माला की नाई गूँथी जा सकती है पर
आयु में विश्वास नहीं किया जा सकता । शरत् ऋतु के बादल के समान स्वल्प, तेल रहित दीपक ओर
तरंग के समान चंचल आयु गई हुई ही देखी जाती है