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Yoga Vasistha — Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Vairagya Prakarana (Dispassion), Sarga 14, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

वैराग्य प्रकरण · सर्ग 14 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीराम उवाच । आयुः पल्लवकोणाग्रलम्बाम्बुकणभङ्गुरम् । उन्मत्तमिव संत्यज्य यात्यकाण्डे शरीरकम् ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

सदश अस्थिर है, वह उन्मत्त के समान असमय में ही इस कुत्सित शरीर को छोडकर चली जाती है, अर्थात्‌ जैसे उन्मत्त पुरुष अपने अत्यन्त उपयोगी उपकरणों को, जब मन में आये, छोड कर चला जाता है, वैसे ही आयु भी शरीर को छोडकर चली जाती है