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श्रीकृष्ण ने गोपियों को “आसक्ति” और “समर्पण” में क्या भेद समझाया?
आसक्ति और समर्पण दिखने में एक जैसे पर भीतर से बिल्कुल अलग। गोपियों का प्रेम क्यों भक्ति का आदर्श है? श्रीमद्भागवत के वेणुगीत और स्कन्दपुराण से जानें।

आसक्ति और दायित्व में अंतर कैसे स्पष्ट करें?
आसक्ति और दायित्व — दोनों काम एक जैसे दिखते हैं पर भीतर से अलग। गीता, योगवासिष्ठ और विवेकचूड़ामणि के आधार पर जानें कब प्रेम आसक्ति बनता है और कर्म दायित्व।

जीवन्मुक्त की संगति से साधारण व्यक्ति को क्या लाभ होता है?
जीवन्मुक्त के पास बैठने से मन शांत क्यों होता है? योगवासिष्ठ, विवेकचूड़ामणि और श्रीमद्भागवत के आधार पर जानें सत्संग का वास्तविक स्वरूप और उसके अद्भुत लाभ।

जीवन्मुक्त की परीक्षा या पहचान कैसे की जा सकती है?
असली जीवन्मुक्त को कैसे पहचानें — वस्त्र से नहीं, चमत्कार से नहीं। योगवासिष्ठ और स्कन्दपुराण के अनुसार जानें उनके आचरण, समता और निर्विकारता के सच्चे लक्षण।

क्या जीवन्मुक्त का बाह्य आचरण आम लोगों से अलग होता है?
जीवन्मुक्त बाहर से बिल्कुल सामान्य लग सकता है — पर भीतर से? योगवासिष्ठ और विवेकचूड़ामणि के आधार पर जानें बालकवत, निद्रालुवत जीवन्मुक्त का असली स्वरूप।

लोकसंग्रह और वैराग्य में संतुलन कैसे साधा जाए?
क्या सन्यास लेना ज़रूरी है या संसार में रहकर भी मुक्ति मिल सकती है? भगवद्गीता और योगवासिष्ठ के आधार पर जानें राजा जनक और ऋषभदेव का आदर्श संतुलन।

ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के बाद व्यवहार में संतुलन कैसे साधें?
ब्रह्मज्ञान के बाद जीवन कैसे जीएं? रमण महर्षि के पंखे वाले उदाहरण से लेकर योगवासिष्ठ और विवेकचूड़ामणि तक — जानें संसार में रहते हुए भी निर्लिप्त रहने का रहस्य।

क्या ब्रह्मज्ञानी के लिए सामाजिक जिम्मेदारियाँ समाप्त हो जाती हैं?
ब्रह्मज्ञान होने के बाद क्या घर परिवार छोड़ना ज़रूरी है? सुदामाजी, जनक और ऋषभदेव के उदाहरण से जानें — जिम्मेदारियाँ समाप्त नहीं होतीं, बस उनसे मेरापन हट जाता है।

क्या ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति के बाद कोई साधक सामान्य जीवन को जी सकता है?
क्या ब्रह्मज्ञानी सब्ज़ी खरीद सकता है, परिवार में रह सकता है? हाँ। जानें कैसे सुदामाजी और जनक जैसे ज्ञानी सामान्य जीवन जीते हुए भी पूर्णतः मुक्त थे।