Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 88
सत्तासीवाँ सर्ग समाप्त अड्डासीवाँ सर्ग अपने शरीररूप भूपीठपर जहाँ तहाँ विद्यमान तथा कौतुकवश आँखों से देखे गये विशेष-विशेष पदार्थों का वर्णन।
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- Verse 1श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे मनुकुल में उत्पन्न श्रीरामजी, जिस तरह मैंने आपसे वर्णन किया, उस…
- Verse 2कहीं पर तो भूपीठ में पति, पुत्र, भाई आदि के मरण से विलाप कर रही स्त्रियों की करुणवेदना सु…
- Verse 3कहीं पर दुर्निवार दुर्भिक्ष के कारण बीभत्स क्रन्दन हो रहा था, कहीं पर दुष्ट चेष्टाओं का ज…
- Verse 4कहीं पर अग्नि के महादाह से देहों के जल जाने के कारण लोग उग्र वेदना से छटपटा रहे थे, कहीं…
- Verse 5कहीं पर जिले के जिले चंचल सामन्तों के द्वारा लूट लिये गये थे, तो कहीं पर जिले के जिले परल…
- Verse 6कहीं पर जलाशयो की पूर्ति से क्यारियों एवं बगीचों एवं बगीचों का सिंचन हो जाने के कारण सस्य…
- Verse 7कहीं पर मारे हर्ष के पुलकित अपने अंग- केशों के सदृश अंकुररूपी रोम उगे हुए थे, कहीं पर जल…
- Verse 8कर रहा था
- Verse 9कहीं पर रण में सामन्ता द्वारा क्षुब्ध सैन्य का संहार किया जा रहा था, कहीं पर शान्त समस्त…
- Verse 10कहीं पर चारों ओर जनता से शून्य जंगल ही जंगल था, उसमें उल्लासी वायुओं के झकोरों से इंकार ह…
- Verse 11कहीं पर हंस, वत्तक आदि पक्षियों से व्याप्त सरोवर में सुन्दर सुन्दर कमल खिले थे, कहीं पर म…
- Verse 12कहीं पर नद, नदी आदि के प्रवाहों के खेलपूर्वक परस्पर संघर्षो से घर-घर ध्वनि हो रही थी, कही…
- Verse 13कहीं पर भीतर कीटमुखों का मृदु स्पन्दन अनुभूत हो रहा था और कहींपर कीड़े, हे श्रीवसिष्ठजी,…
- Verse 14भद्र, कहीं पर वट॒वृक्षों के जंगल में पृथ्वी में शिखाओं के घुस जाने के कारण मृत्तिकाभाग के…
- Verse 15कहीं पर पर्वतो की शिलाओं के सदृश घनीभूत वृक्षों ने परस्पर अत्यन्त संश्लिश्ट होकर दिशाओं क…
- Verse 16कहीं पर इतने घने वृक्ष उगे थे कि पृथ्वी पर सूर्य अपनी किरणों को ठीक ठीक रीति से फैला नहीं…
- Verse 17कहीं पर पर्वतों की चोटियों पर रहनेवाले हाथियों के दन्तप्रहाररूप वों के कठोर आघात वृक्षों…
- Verse 18कहीं पर यह दृश्य देखा कि नेत्रो को मृदि हुए प्रसन्नशरीर समाधिनिष्ठ महात्माओं को अपूर्व रो…
- Verse 19कहीं पर मक्खी, जूँ एवं मच्छरों के समूहों के निवास के मैले- कुचैले वर्त्र के सरीखा ही भूतल…
- Verse 20कहीं पर हिमालय आदि प्रदेशों में शीत से छिन्न-भिन्न अंगोवाले जीवों की जर्जर हुई त्वचा को प…
- Verse 21कहीं पर विदलित कोमल अंगो के भीतर कीटसमूह घुस रहा था, कहीं पर अंग आदि उत्पन्न ही हो रहे थे…
- Verse 22भद्र, अपने भूतलरूप शरीर में मैंने कहींपर यह अनुभव किया कि बीजों मे वृष्टि की अधिकता हुई,…
- Verse 23हे श्रीरामजी, मेरे भूतलरूप अंगों में कहीं पर सरोवरों ने मन्द-मन्द पवनसे हिलाये गये कोमल क…