Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 22
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 22
संस्कृत श्लोक
शनैरन्तर्निलीनाम्बुकृताह्लादं बहिश्च रसोन्नामाङ्कुररोमौघं क्वचिद्वर्षविजृम्भितम् ॥ २२ ॥
हिन्दी अर्थ
भद्र, अपने भूतलरूप
शरीर में मैंने कहींपर यह अनुभव किया कि बीजों मे वृष्टि की अधिकता हुई, इससे धीरे-धीरे उनके
भीतर प्रविष्ट जलकणोँ से पहले आहार हुआ, फिर उसके बाद उनके बाहर प्रकट हुए अंकुररूपी रोमों
की अभिवृद्धि हुई