Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 88, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 88 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
अरण्यं क्वचिदाशून्यमुल्लसद्वातझंकृति ।
जंगलं क्वचिदालूनव्युप्तसंपन्नसस्यकम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
कहीं पर चारों ओर जनता से शून्य जंगल
ही जंगल था, उसमें उल्लासी वायुओं के झकोरों से इंकार हो रहा था । कहीं पर जंगल में पहले
काटा गया फिर बोया गया, फिर तैयार हुआ धान दीख पड़ता था