Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 5
चौथा सर्ग समाप्त पोचिवों सर्ग जितेन्द्रिय पुरुषों में ही शास्त्रों का उपदेश सफल होता है, अजितेन्द्रियो मे नहीं, इस विषय में भुशुण्ड द्वारा कथित विद्याधर कथा का वसिष्ठजी द्वारा वर्णन ।
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- Verse 1महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे रामजी, सबसे पहले मन के सहित इन्द्रियों के स्वभाव को (विषयों क…
- Verse 2जिस दग्धबुद्धि ने अपने भीतर विषयों की ओर दौडनेवाली अपनी इन्द्रियों के स्वभाव को नहीं जीत…
- Verse 3शुद्ध निर्मल वस्त्र आदि में तेल विन्दु की नाई शुद्ध विमल चित्तवाले मनुष्य में थोड़ा भी उप…
- Verse 4इस विषय में विद्वान लोग इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया करते हैं । भुशुण्डजी ने बहुत दिन…
- Verse 5बात बहुत पुरानी है, कभी मेरु शिखर के एकान्त कोटर में किसी अध्यात्म कथा के प्रस्ताव में श्…
- Verse 6मैंने भुशुण्डजी से पूछा था कि हे प्रिय, यह बतलाओ कि इस संसार में मुग्धबुद्धि तथा आत्मज्ञा…
- Verse 7भुशुण्डजी ने कहा : हे भगवन्, लोकालोकान्तर पर्वत की चोटी पर बहुत दिन पहले एक विद्याधर रहत…
- Verse 8अनेक तरह के तप, यम ओर नियम से अक्षीणायु (परिपूर्ण आयु) होकर पूर्व कालमें वह चार कल्पं तक…
- Verse 9तदनन्तर चौथे कल्प के अन्त में चिरकालतक तप, नियम आदि के अनुष्ठान से उसको ऐसे विवेक उदित हु…
- Verse 10विवेकस्वरूप दिखलाते हैं / पुनः-पुनः जन्म, पुनः-पुनः मृत्यु तथा पुनः-पुनः वृद्धावस्था न हो…
- Verse 11यों विचार करके पांच प्राण, दस इन्द्र्यो, मन, बुद्धि तथा स्थूल देह इन अठारह अवयवों से युक्…
- Verse 12मेरे समीप आकर बड़े आदर के साथ उसने नमस्कार किया । मैंने भी सत्कार से उसे बैठाया । अनन्तर…
- Verse 13पत्थर से भी अधिक दृढ़ और बलवान्, छेदन और भेदन में दक्ष अपने शरीर के अन्दर प्रविष्ट हुए ब…
- Verse 14हे मुने ये इन्द्र्यो हृदय में रूढ हैं, तमोमय हैं, अन्धकार से भरे सघन जंगल के तुल्य हैं, क…