Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
मामाजगाम संप्रष्टुमष्टादशमयीं पुरीम् ।
स्वामुपोह्य विरक्तात्मा संसारारसतां गतः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
यों विचार करके पांच प्राण, दस इन्द्र्यो, मन, बुद्धि तथा स्थूल देह इन
अठारह अवयवों से युक्त अपनी पुरी को चिरकाल तक धारण करने से श्रान्त तथा संसार के रससे
विरक्त वह महात्मा मेरे पास कुछ पूछने आया