Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
भुशुण्ड उवाच ।
आसीद्विद्याधरः पूर्वमनात्मज्ञः सुखेदितः ।
लोकालोकान्तरशृङ्गे शुष्क आर्यो विचारवान् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
भुशुण्डजी ने कहा : हे भगवन्, लोकालोकान्तर पर्वत की चोटी पर बहुत दिन पहले एक
विद्याधर रहता था । वह अजित इन्द्रियों से अत्यन्त खेद को प्राप्त अतएव विश्रान्तिरस से हीन,
आत्मज्ञानशून्य, विचारवान् तथा आयुवृद्धि के हेतुभूत सदाचार से सम्पन्न था