Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 5, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 5 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
पुनर्मृतिः पुनर्जन्म जरा मेति विभावयन् ।
लज्जेऽहं तत्किमेकं स्यात्स्थिरमित्यवमृश्य सः ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
विवेकस्वरूप दिखलाते हैं /
पुनः-पुनः जन्म, पुनः-पुनः मृत्यु तथा पुनः-पुनः वृद्धावस्था न हो, क्योंकि इसका विचार
करते हुए मैं लज्जित हो रहा हूँ। अतः जहाँ ये बिलकुल न हों, ऐसी एक स्थिर कौन-सी वस्तु हो
सकती है ?