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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 21

बीसवाँ सर्ग समाप्त डक्कीसवाँ सर्ग शुभ ओर अशुभ दो तरह की ज्ञानबन्धुता है, इनमें शुभ ग्राह्य है ओर अशुभ हेय है, इसका यत्नपूर्वक लक्षणों द्वारा वर्णन ।

10 verse-groups

  1. Verse 1इन दोनों में पहले हेय ज्ञानबन्धुता का वर्णन करने के लिए भूमिका रवते हैं / महाराज वसिष्ठजी…
  2. Verse 2श्रीरामजी ने कहा : हे मुने, ज्ञानवन्धु किसे कहते हैं और ज्ञानी कौन कहा जाता है तथा ज्ञानव…
  3. Verse 3महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, जो शास्त्रों को केवल अपने भोग के लिए शिल्पी की तरह…
  4. Verse 4जिसका शास्त्राभ्यासजनित शाब्दिक बोध भोग-व्यवहारों में वैराग्योपरम आदि फलों से फलित नहीं द…
  5. Verse 5एकमात्र भोजन, वस्त्र आदि से सन्तुष्ट होकर भोजन आदि की प्राप्ति को ही जो शास्त्राध्ययन का…
  6. Verse 6शुभानामक दूसरी ज्ञानबन्धुता को लक्षण बतनाकर दिखलाते हैं / जो शात्त्रार्थज्ञान के उचित, कि…
  7. Verse 7अनात्मशासप्रो के अभ्यास में तत्पर हुए भी पुरुष तत्‌-तत्‌ अर्थज्ञानों से सम्बद्ध होते दिखा…
  8. Verse 8अतएव उक तरह के ज्ञानावभास की प्राप्ति से सन्तुष्ट रहनेवालों में अशुभ ज्ञानबन्धुता ही है,…
  9. Verse 9बाह्य ओर आभ्यन्तर विषयों की अनेक वृत्तिरूप अज्ञान, इन वृत्तियों के कारण एवं आश्रय प्रमाता…
  10. Verse 10तब मुमु को किस तरह रहना चाहिए, इस पर कहते हैं / इस संसार में मुमुक्षु पुरुष को अपने आहार…