Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, Verse 6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 6
संस्कृत श्लोक
प्रवृत्तिलक्षणे धर्मे वर्तते यः श्रुतोचिते ।
अदूरवर्तिज्ञानत्वाज्ज्ञानबन्धुः स उच्यते ॥ ६ ॥
हिन्दी अर्थ
शुभानामक दूसरी ज्ञानबन्धुता को लक्षण बतनाकर दिखलाते हैं /
जो शात्त्रार्थज्ञान के उचित, किये जानेवाले वेदान्तश्रवण में चित्तशुद्धि द्वारा अनुकूल निष्काम
अग्निहोत्र आदि धर्मो में अथवा श्रुतिबोधित अपने अधिकार और कुलाचार आदि के उचित (7) सत्कर्मों
के अनुष्ठान में प्रवृत्त होता है वह तत्त्वज्ञान का निकटवर्ती होने के कारण ज्ञानबन्धु कहा जाता है