Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 21, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 21 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
ज्ञानिनैव सदा भाव्यं राम न ज्ञानबन्धुना ।
अज्ञातारं वरं मन्ये न पुनर्ज्ञानबन्धुताम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
इन दोनों में पहले हेय ज्ञानबन्धुता का वर्णन करने के लिए भूमिका रवते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामजी, मनुष्य को सदा ज्ञानी (५) ही होना चाहिए,
ज्ञानबन्धु (~) नहीं होना चाहिए । मैं अज्ञानी को अच्छा समझता हूँ, परन्तु ज्ञानबन्धुता को
(५) ज्ञानी का लक्षण आगे चलकर बतलाया जायेगा ।
(७) ज्ञान के बहाने सत्कर्म में श्रद्धा के त्याग से भोगों मेँ लम्पट बनाकर जो अपने को और
दूसरे को अनर्थो के द्वारा बाँध देता है, वह ज्ञानबन्धु कहा गया है ।
अच्छा नहीं समझता
सर्ग सन्दर्भ
बीसवाँ सर्ग समाप्त डक्कीसवाँ सर्ग शुभ ओर अशुभ दो तरह की ज्ञानबन्धुता है, इनमें शुभ ग्राह्य है ओर अशुभ हेय है, इसका यत्नपूर्वक लक्षणों द्वारा वर्णन ।