Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 202
दो सौवाँ सर्ग समाप्त दोसौ एकवाँ सर्ग गुरु द्वारा पुनः आदरपूर्वक पूछे गये श्रीरामचन्द्रजी ने पूर्णानन्द मेँ अपनी विश्रान्ति प्रकट की, यह वर्णन |
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- Verses 1–6श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : इसके पश्चात् नीचे सभा प्रदेश में जब धीरे धीरे साधुवादो का तांता…
- Verse 7हे राम, आप अपने विशाल कुलरूप आकाश के चन्द्रमा है । हे कमलनेत्र आप इससे अतिरिक्त क्या सुनन…
- Verse 8हे रामजी, आज इस स्थिति का स्वयं आप कैसा अनुभव करते हैं इस जागतिक आभास को आप कैसा देखते है…
- Verse 9भगवान् वसिष्ठजी के यह कहने पर गुरु के मुँह को देख रहे राजकुमार श्रीरामचन्द्रजी ने बिना घ…
- Verses 10–13प्रदान करनेवाली सभी भ्रान्तियाँ शान्त हो गई हैं । में निर्मल आकाश के समान अतिनिर्मल अपने…
- Verses 14–21हे मुनिवर, परम शान्ति को प्राप्त हुए मेरे मन के सकल विषयस्मरण शान्त हो चुके हैं, उसका विष…
- Verse 22इष्ट वस्तु की प्राप्ति से न तो मैं अन्दर मन में सन्तुष्ट होता हूँ और न बाहर शरीर से हर्षि…
- Verse 23इस प्रकार से स्थित हुए मुझे, अज्ञानियों के अभिमत बन्धु. जन, राज्य आदि के नाशो से अथवा, वृ…
- Verse 24हे मुनिवर, मैं आत्माराम हूँ, बाह्य इन्द्रियों से अलक्ष्य हूँ, मन से भी दुर्लक्षय हु, निरा…
- Verses 25–27देह में अभिव्यक्त का देहातीत रहने में दृष्टान्त कहते है । जैसे वृक्षगत पुष्प में अभिव्यक्…
- Verses 28–29तो आप आगे कैसे ओर किस तरह व्यवहार करेगे ? इस प्रश्न पर कहते हैं। जैसे ही प्रबुद्ध तथा अप्…
- Verse 30हे मुनिनायक, मैं भोजन करता हूँ, पीता हूँ, बैठता हूँ, अपने कर्तव्य का पालन करता हूँ। आपके…
- Verses 31–33श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, यह बड़े सौभाग्य का विषय हे कि आपने आदि, मध्य और…
- Verses 34–35हे पुत्र, हर्ष है कि आपने आत्मतत्त्वज्ञानी होकर बोध से रघुवंशियों की अतीत, वर्तमान और भाव…