Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, Verses 1–6
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, verses 1–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 202 · श्लोक 1-6
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
एतच्छ्रुत्वा वसिष्ठस्य वचः संसदि पार्थिवाः ।
सिक्ता इवामृतापूरैरन्तःशीतलतां ययुः ॥ १ ॥
रामः कमलपत्राक्षो रराज वदनेन्दुना ।
क्षीरोद इव संपूर्णः सुधापूरेण चारुणा ॥ २ ॥
वामदेवादयः सर्वे तत्त्वज्ञानविशारदाः ।
अहो भगवता ज्ञानमुक्तमित्यूचुरादरात् ॥ ३ ॥
शान्तान्तःकरणो राजा मुदा दशरथो बभौ ।
तुष्ट्यैव संप्रहृष्टाङ्गो नवां द्युतिमुपागतः ॥ ४ ॥
श्रीराम उवाच ।
भगवन्भूतभव्येश त्वयास्माकमलं मलम् ।
संप्रमृष्टमिदं हेम्नः श्यामत्वमिव वह्निना ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : इसके पश्चात् नीचे सभा प्रदेश में जब धीरे धीरे साधुवादो का तांता
शान्त हो चुका, ज्ञानोपदेश पाकर राजगण विकसितवदन हो गये, संसार -भ्रान्ति के विलीन होने पर
लोग अपनी अज्ञानअवस्था के चरित्र को स्वयं ही तत्त्व की ओर पूर्णतया अग्रसर हुए चित्त से हसने लगे,
सभागत विवेकी लोग चित्तवृत्ति के प्रत्यकृप्रवणपूर्वक चिदेकरसानन्द के सम्यक् आस्वादन में तत्पर हो
ध्यानावस्थित की तरह शान्त हो गये, भ्रातृसहित श्रीरामचन्द्रजी गुरु के आगे गुरुजी के दीप्तिमान् मुख
पर टकटकी लगाकर हाथ जोड़े पद्मासन बोधि बैठ गये तथा महाराज दशरथ ध्यानस्थ से होकर अपने
अन्दर आदि, मध्य ओर अन्त में पवित्रता बढानेवाली अलौकिक जीवन्मुक्तिरिथिति का, अनुभव कर
रहे थे उस समय मुनि वसिष्ठजी भक्त राजा आदि की पूजा ग्रहण करने के लिए क्षणभर चुपचाप
ठहरकर धीरे-धीरे बोले
सर्ग सन्दर्भ
दो सौवाँ सर्ग समाप्त दोसौ एकवाँ सर्ग गुरु द्वारा पुनः आदरपूर्वक पूछे गये श्रीरामचन्द्रजी ने पूर्णानन्द मेँ अपनी विश्रान्ति प्रकट की, यह वर्णन |