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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, Verse 22

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, verse 22 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 202 · श्लोक 22

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

इष्ट वस्तु की प्राप्ति से न तो मैं अन्दर मन में सन्तुष्ट होता हूँ और न बाहर शरीर से हर्षित होता हूँ तथा न पुष्ट होता हूँ एवं अनिष्ट वस्तु की प्राप्ति से न रोता हूँ। अवश्यकर्तव्य लोकिक और वैदिक कार्य करता हू । मैं केवल एक ही हू। मेरा भ्रमजाल दूर भाग चुका है