Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, Verses 10–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 202, verses 10–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 202 · श्लोक 10-13
संस्कृत श्लोक
अहो बत पवित्रेण शीतेन ज्ञानवारिणा ।
त्वया सिक्तोस्मि हृष्यामि पद्मवद्धृदये स्वयम् ॥ १० ॥
इयमद्य मया लब्धा पदवी त्वत्प्रसादतः ।
यस्यां स्थितस्य मे सर्वममृतत्वं गतं जगत् ॥ ११ ॥
अन्तःप्रसन्नमतिरस्तसमस्तशोकः शोभां गतोऽहममलाशय एव शान्त्या ।
आनन्दमात्मनि गतः स्वयमात्मनैव नैर्मल्यमभ्युपगतोऽस्मि नमोस्तु मह्यम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
प्रदान करनेवाली सभी भ्रान्तियाँ शान्त हो गई हैं । में निर्मल आकाश के समान अतिनिर्मल अपने
स्वरूप से स्थित हूँ। मेरी चिद्अचिद् ग्रन्थि शान्त हो गई है, मेरे सकल विशेषण (उपाधियाँ) विलीन हो
चुके हैं तथा ब्रह्मभाव से विशुद्ध जगत् में मेरी बुद्धि स्फटिक के मन्दिर के मध्य में स्थित स्फटिक मणि
की तरह निर्मलतम हे । मेरा शान्त मन इसके बाद ओर कुछ उपदेश सुनना तथा कर्म-सम्पादन करना
नहीं चाहता हे । परम तृप्ति को प्राप्त हुआ वह सुषुप्त के समान स्थित है