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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 198

एक सौ छानबेवाँ सर्ग समाप्त एक सौ सतानबेवाँ सर्ग वैवधिकाख्यान- तात्पर्य के व्याख्यान क्रम से आत्मज्ञान में गुरु, शास्त्र आदि की स्पष्टतः हेतुता का वर्णन ।

23 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिश्रेष्ठ, जैसे मैं इस वैवधिकों के (बहँगी ढोनेवाले कीरकों क…
  2. Verses 2–4श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामजी, जिन वैवधिकों का (बहँगी ढोनेवालों का) जिक्र मैंने आप…
  3. Verses 5–6अत्यन्त कृपण मानव अपने भोगो की इच्छा से ही शस्त्रो में प्रवृत्त होता है तथापि शास्त्र गुड…
  4. Verse 7पहले शास्त्र और विचारों से क्या होगा इस सन्देह के कौतूहल से पुरुष शास्त्रों में प्रवृत्त…
  5. Verse 8जिस पुरुष को परमब्रह्मरूप उत्तम तत्त्व का साक्षात्कार नहीं हुआ वह विषयभोग के लिए सन्देह स…
  6. Verse 9अपनी-अपनी वासना के अनुसार शास्त्र के अन्यादृश फल की संभावना करते हुए लोग उसमें प्रवृत्त ह…
  7. Verse 10सव लोगों की स्वभावतः सन्मार्गप्रवृत्ति में साधुओं का सदाचार दर्शन ही कारण है, इसलिए साधुओ…
  8. Verse 11साधुओं के आचार के कारण ही अज्ञानी लोग शास्त्र-फल में सन्देह रहते भी भोगप्राप्ति की आशा आद…
  9. Verse 12भोग के लिए शास्त्र आदि में प्रवृत्त हुआ अज्ञानी पुरुष जैसे काष्ठार्थी वेवधिक को जंगल में…
  10. Verses 13–14जैसे वैवधिकों में से किन्हीं को वन से चन्दन की कीमती लकड़ियाँ मिलीं, किन्हीं को चिन्तामणि…
  11. Verses 15–16हे श्रीरामचन्द्रजी, शास्त्र आदि में त्रिवर्ग का (धर्म, अर्थ ओर काम का) मुख्य वृत्ति से (अ…
  12. Verse 17यद्यपि शास्त्र मे मुख्यवृत्ति से (अभिधा से) ब्रह्म-बोधन की सामर्थ्य नहीं है तथापि लक्षणा…
  13. Verses 18–19सब पदों को मातकर उत्कृष्टता को प्राप्त यह परम बोध न शास्त्र से, न गुरुजी के उपदेशवाक्य से…
  14. Verse 20बार-बार अभ्यास करने से शास्त्र से विशुद्ध हुआ, सकल भोगों की इच्छा से रहित तथा प्रतिदिन अन…
  15. Verses 21–22हे श्रीरामचन्द्रजी, इस शास्त्र से अविद्या का सात्त्विक अंश उत्कृष्ट (उन्नत) बनाया जाता है…
  16. Verses 23–25जैसे सूर्य और समुद्र का आमना-सामना होने पर उनकी इच्छा न होने पर भी पहले से अदृश्य भी तीसर…
  17. Verse 26जैसे सूर्य ओर समुद्र के दर्शन से देह में उनके वैधर्म्य आदि का बोधरूप विवेक होता हे वैसे ह…
  18. Verses 27–28शास्त्रकृत विचाररूप विकल्पो से भ्रान्तिजनित विकल्पो के क्षालन से आत्मनैर्मल्य की प्राप्ति…
  19. Verse 29ऊपर (पुनः पुनः आत्मतत्त्व के परीक्षण से“ कहा है उस पर किस प्रमाण से कैसे परीक्षण से ? ऐसी…
  20. Verse 30जैसे यद्यपि आकाश में प्रकाश चारों ओर फैला रहता है तथापि प्रभा ओर दीवार के संग से ही अभिव्…
  21. Verse 31आत्मज्ञान की प्राप्ति मेँ अन्यान्य (आत्मज्ञान मे अनुपयोगी) शास्त्रों के श्रवण अथवा उनकी व…
  22. Verse 32जो शास्त्रश्रवण ज्ञान की प्राप्ति के लिए होता है वही शास्त्र श्रवण है, वही ज्ञान है जिससे…
  23. Verses 33–44पूर्वोक्त सब कुछ शास्त्र के अधीन है, इसलिए शास्त्राध्ययन आवश्यक है ऐसा कहते हैं । पूर्वोक…