Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, Verses 15–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, verses 15–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 198 · श्लोक 15,16
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, शास्त्र आदि में त्रिवर्ग का (धर्म, अर्थ ओर
काम का) मुख्य वृत्ति से (अभिधा से) ही उपदेश है लेकिन ब्रह्मप्राप्ति (ब्रह्मवोध) अवाच्य (अनभिधेय)
होने के कारण ब्रह्म का प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रों में भी पद ओर वाक्य की मुख्यवृत्ति से नहीं हे । जैसे
वसन्त आदि काल-शोभा तत्-तत् ऋतुओं के फूल, फल, पल्लव आदि की उत्पत्ति से सूचित होती
हुई स्वानुभव से प्रतीत होती है वैसे ही ब्रह्मप्राप्ति केवल सकल वाक्यार्थ से आलंकारिकों के मत में
व्यंजनावृत्ति से ओर अन्यो के मत में लक्षणा वृत्ति से सूचित (ध्वनित) होती हुई स्वयं अपने अनुभव से
अवगत होती हे