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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, Verses 5–6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 198, verses 5–6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 198 · श्लोक 5,6

संस्कृत श्लोक

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हिन्दी अर्थ

अत्यन्त कृपण मानव अपने भोगो की इच्छा से ही शस्त्रो में प्रवृत्त होता है तथापि शास्त्र गुड़ जिह्निका के न्याय से इसे पहले फलास्वादो द्वारा (भोगलाभ द्वारा) आकृष्ट कर अन्ते अपने परम तात्पर्य के विषयभूत परम पद में अवश्य ले ही जाता है, ऐसा कहते है । भोगपरवश भोगार्थी पुरुष पहले भोग के लिए ही शास्त्र में प्रवृत्त होता हे । शास्त्र से पहले भोगरूप फल की प्राप्ति होने पर उनमें क्रमशः दृढ विश्वास हो जाने से उनमें वर्णित साधनों के अभ्यास से भिन्न- भिन्न भूमिकाओं के आरोहण के क्रम से चिन्तित शास्त्र के परम तात्पर्य के विषयभूत मोक्षनामक ब्रह्म को परवश होता हुआ भी अवश्य प्राप्त होता है । जैसे सार असार के विचार ओर अन्वेषणादि युक्त वैवधिक काष्ठ ढूँढ़ने को उद्यत हो वन में गया पर वहाँ उसे मणि प्राप्त प्राप्त हुई वैसे ही पुरुष भोग के लिए शास्त्र को ग्रहण करता हुआ परमपद को प्राप्त करता है