Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 165
एक सौ तिरसठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौसठवाँ सर्ग जीवभाव और जगद्जाव के मार्जन द्वारा ब्रह्मभाव के उद्गम से जीव और जगत् में ब्रह्मसमरसता का प्रसाधन |
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- Verse 1उनमें सर्वप्रथम जीवभाव को मिटाने के लिए श्रीवशसिष्ठजी आरम्भ करते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा…
- Verse 2यदि ऐसी बात है तो नक्षत्रों का भी आकाश में समानप्रकाशनस्वभाव दिखाई देता है अतः उनमें परस्…
- Verse 3तो क्या अविद्या, अन्तःकरण, देह आदि से भेदावस्थाओं मे पहले जीव भिन्न ही थे, इस समय विद्या…
- Verse 4यदि ऐसा है तो पहले अहन्त्वः आदि मल का उसमें दर्शन कैसे हुआ ? इसपर कहते है । जो अज्ञानी की…
- Verse 5क्यो नहीं जानते 2 इसपर कहते हैं। यह वह है, यह मैं हूँ, यह सत्य है इत्यादि भेदबुद्धियाँ अज…
- Verse 6भेदभ्रमज्ञान नहीं टिक सकते हैं
- Verses 7–9इस प्रकार जीवभाव को मिटाकर जगत्भाव को भी मिटाने के लिए उपक्रम करते है। यह दृश्य न पहले थ…
- Verse 10“सदेव सौम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्" (हे सौम्य, सृष्टि के पूर्व यह एक अद्वितीय सत् ही…
- Verses 11–17इसी अर्थ को दृढ़ करते हुए पुनः स्पष्ट कहते हैं। इसलिए सृष्टि के आरम्भ में कोई भी अपने-आप…