Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, Verse 2
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, verse 2 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 165 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
स्वप्नो जाग्रत्प्रविशति जाग्रत्स्वप्नात्प्रबुध्यते ।
जाग्रत्स्वप्नं प्रविशति प्रबुद्धः स्वप्नजाग्रतः ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि ऐसी बात है तो नक्षत्रों का भी आकाश में समानप्रकाशनस्वभाव दिखाई देता है अतः उनमें
परस्पर अभेद तथा तेज की भी निरवयवता क्यो न होगी 2 यदि उनके भिन्नदेशस्थ होने और प्रकाश में
कमी-बेशी होने के कारण उनकी परस्पर अभेदापत्तिका परिहार करो तो वह परिहार जीवों में भी
समान है, इस शंका पर कहते है।
नक्षत्रों के भेद के समान जीवों का भेद नहीं है, किन्तु घडे, मटके आदि के आकाश के भेद के तुल्य
ओपाधिक भेद हे । वह भेदक अन्तःकरण आदि उपाधिभूत वस्तु “मेँ अखण्डाकार अपरोक्ष ब्रह्म हूँ" इस
ज्ञान को प्राप्त कर अपने उपाधिरूप ओर उपाधिकृत भेद का त्याग कर देती हे । उपाधिभेद के हट
जानेपर प्रतिज्ञात अर्थ की (जीवब्रह्मअभेद की) सिद्धि हो जाती हे । अथवा पहले जीवों की अविद्या से
परस्पर विरुद्धधर्मता दिखला कर ब्रह्मैकवाक्यता के विच्छेद से भेदसा, बन्धसा, अनर्थसा हुआ । इस
समय विद्या से अविद्या का निरासकर विरुद्ध धर्म की निवृत्ति द्वारा फिर ब्रह्मैकवाक्यता के सम्पादन से
अवयवअवयविभाव आदि दूसरा भेदक क्या होगा यानी कुछ नहीं