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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 165 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

तज्जाग्रज्जाग्रतीवेह न तु स्वप्नः कदाचन । स्वप्ने स्वप्नो जाग्रदेव न तु जाग्रत्कदाचन ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि ऐसा है तो पहले अहन्त्वः आदि मल का उसमें दर्शन कैसे हुआ ? इसपर कहते है । जो अज्ञानी की विषयभूत मलिन वस्तु है उसको वही (अज्ञानी ही) जानता है । हम तो न “अहम्‌” को जानते हैं, न 'त्वम्‌ को जानते हैं, न अज्ञ को जानते हैं और न अज्ञ के विषयभूत उस मलिन वस्तु को ही जानते हे