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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 165 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । जाग्रत्स्वप्ने स्वप्न एव जाग्रत्त्वमनुगच्छति । स्वप्नजाग्रति जाग्रत्तु स्वप्नतामुपगच्छति ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें सर्वप्रथम जीवभाव को मिटाने के लिए श्रीवशसिष्ठजी आरम्भ करते हैं। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, चारों ओर से परिपूर्ण चिद्रूपी सूर्य के मण्डल का अन्दर स्फुरण होनेपर जगत्‌ में प्रसिद्ध सकल जीवाणु चिद्रूपसूर्य के तुल्य हैँ यानी अग्नि और स्फुल्लिंगों की तरह समान प्रकाशन स्वभाववाले हैँ । इस कारण चिद्रूपी सूर्य की अनवयवात्मता सिद्ध हुई । हाथ, पैर आदि अवयव परस्पर विलक्षण आकारवाले हैं और उनका स्वभाव भी भिन्न दिखाई देता है ओर उधर अवयवी की रूपरेखा (बनावट) अवयवो से भिन्न होती है अतः उनमें परस्पर भेद ओर अवयव- अवयविभाव लोग में प्रसिद्ध है किन्तु जीव ब्रह्म के अत्यन्त तुल्य होनेपर उनमें न तो भेद है, न लोकसिद्ध अवयव-अवयविभाव ही हे

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ तिरसठवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चौसठवाँ सर्ग जीवभाव और जगद्जाव के मार्जन द्वारा ब्रह्मभाव के उद्गम से जीव और जगत्‌ में ब्रह्मसमरसता का प्रसाधन |