Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 165, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 165 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
लघुकालात्मकः स्वप्नः सर्वदैव हि जाग्रति ।
लघुकालात्मकं जाग्रत्स्वप्नकाले सदैव च ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
क्यो नहीं जानते 2 इसपर कहते हैं।
यह वह है, यह मैं हूँ, यह सत्य है इत्यादि भेदबुद्धियाँ अज्ञानी में ही होती हैं, तत्त्वज्ञानी मे कदापि
नहीं हो सकतीं । भला बतलाइये तो सुमेरु में कहीं मृगतृष्णा हो सकती है ? क्योकि प्यासे पुरुष
की थकी-माँदी दृष्टि से मृगतृष्णा की प्रतीति होती है, स्वर्गभूत सुमेरु में किसी को प्यास, थकान
आदि नहीं होते, अतः वहाँ उसकी प्रतीति क्योँकर होगी ? यह भाव हे