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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 155

एक सौ तिरपनर्वोँ सर्ग समाप्त एक सौ चौ वनवोँ सर्ग मुनि द्वारा विचार से उत्पन्न अपनी जीवन्मुक्त स्थिति तथा अभ्यासहीन व्याध की परम पद में अनवस्थिति का वर्णन |

14 verse-groups

  1. Verse 1मुनिजी अपने विचार की फलभूत जीवन्मुक्तस्थिति का विस्तार से वर्णन करते हैं। मुनि ने कहा : ह…
  2. Verse 2अद्वैत होने के कारण न मेरा कोई आधार है ओर न मैं ही किसी का आधार हू, अभिमानरहित, आश्रयविही…
  3. Verse 3व्यवहारतः यथाप्राप्त कृत्य का कर्ता हूँ, किन्तु यथार्थतः कभी भी कर्ता नहीं हूँ, क्योकि जो…
  4. Verse 4द्युलोक, पृथिवी, वायु, आकाश, विविध पर्वत, नदियाँ दिशाएँ आदि सकल भूत सब जीवों के एकमात्र च…
  5. Verse 5हे व्याध, मैं शान्त हूँ, चारों ओर से आनन्दसागर मेँ मग्न हूँ, दुःखसम्पर्कशून्य केवल आत्मसु…
  6. Verse 6हे व्याध, इस प्रकार जैसी स्थिति है उसके अनुकूल यहाँपर स्थित हुए मेरे सामने आज काकतालीय के…
  7. Verses 7–9अनुसार मैं कह चुका हूँ । हे लुब्धक, इन सबको मिथ्या जानकर तुम शान्त होओगे, क्योकि यह चिदाक…
  8. Verse 10स्पष्ट रीति से प्रतीत हो रहे मनुष्य, देवता, पशु-पक्षी, पर्वत, पेड़ आदि की स्वप्नतुल्यता अ…
  9. Verse 11मुनिजी ने कहा : हे व्याध, जैसा तुम कहते हो वैसा ही यह सब परस्पर स्वप्न के समान स्थित है।…
  10. Verses 12–14दृश्य को जिसने जैसा जाना वैसा वह उसका अनुभव करता है । दृश्य वस्तु नाना है और एक भी है, जै…
  11. Verse 15हे व्याध, प्रकृष्ट बोधवाले यद्यपि इस प्रकार तुम पूर्णरूप से बोधित हुए हो तथापि तुम्हारी ब…
  12. Verse 16यह बोध अभ्यास द्वारा अत्यन्त परिपक्व हुए बिना हृदय के अन्दर वैसे ही प्रविष्ट नहीं होता जै…
  13. Verse 17अभ्यास से बोध की वरमविश्रान्ति सिद्ध होने पर चित्त को ही वरमविश्रान्ति का अनुभव रखनेवाले…
  14. Verses 18–56अपने द्वारा उक्त अर्थ मे भगवद्वचन की संमति दिखलाते है। अन्दर अभिमान और मोह से रहित और बाह…