Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verse 17
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, verse 17 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
इत्थं तपस्त्वया घोरं कार्यं युगशतं पृथु ।
परमेष्ठी ततस्तुष्टस्त्वामुपैष्यति सामरः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
अभ्यास से बोध की वरमविश्रान्ति सिद्ध होने पर चित्त को ही वरमविश्रान्ति का अनुभव रखनेवाले
पुरुष निर्वाण कहते हैं, ऐसा कहते है ।
एकमात्र गुरु ओर शास्त्र के सेवनरूप अभ्यास से बोध के परमपद मेँ विश्रान्त होनेपर द्वैत और
अद्वैत दुष्टियों की शान्ति होने पर चित्त निर्वाण कहलाता हे