Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
अग्निरुवाच ।
इत्याकर्ण्याथ स व्याधस्तदा तस्मिन्वनान्तरे ।
आसीच्चित्रकृताकार इव विस्मयमन्थरः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
मुनिजी अपने विचार की फलभूत जीवन्मुक्तस्थिति का विस्तार से वर्णन करते हैं।
मुनि ने कहा : हे व्याध, इस प्रकार निर्णय करके मैं इस दृश्य में सन्तापरहित, वीतराग
(आसक्तिरहित), शंकारहित, अहंकाररहित, निर्वाण (मुक्त ) स्वरूप स्थित हूँ
सर्ग सन्दर्भ
एक सौ तिरपनर्वोँ सर्ग समाप्त एक सौ चौ वनवोँ सर्ग मुनि द्वारा विचार से उत्पन्न अपनी जीवन्मुक्त स्थिति तथा अभ्यासहीन व्याध की परम पद में अनवस्थिति का वर्णन |