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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, Verses 12–14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 155, verses 12–14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 155 · श्लोक 12-14

संस्कृत श्लोक

मुनिरुवाच । ज्ञानं तदुपदिष्टं ते जीर्णदार्वल्पकाग्निवत् । संस्थितं हृदये किंतु दाह्यमाक्रम्य नोचितम् ॥ १२ ॥ नाभ्यासेन विना ज्ञाने शिवे विश्रान्तवानसि । अभ्यासेन तु कालेन भृशं विश्रान्तिमेष्यसि ॥ १३ ॥ भविष्यदिदमात्मीयमथाकर्णय निर्णयम् । मम वर्णयतः कर्णभूषणं भूतलाद्भुतम् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

दृश्य को जिसने जैसा जाना वैसा वह उसका अनुभव करता है । दृश्य वस्तु नाना है और एक भी है, जैसे एक घडा नाना कपाल, कपालिका आदि उनकी अवयवपरम्परा से परमाणु पर्यन्त नाना वस्तुरूप और एकत्व की प्रतीति से एकवस्तुरूप भी है जो नानात्व (भेद) दर्शी हैं उनके लिए उन दोनों मे से एकत्व असत्‌ है ओर जो एकत्त्वदर्शी हैं, उनके लिए नानात्व असत्‌ हे । भेदाभेद दर्शियों के लिए दोनों विकल्प से सत्‌ और दोनों असत्‌ हे । तत्त्वज्ञानियो के लिए तो जाग्रत में स्वप्ननगर के सदुश तथा पहले कभी दृष्टिगोचर न हुए दूर देशस्थ दृश्यमान नगर के तुल्य वेदनमात्र होने के कारण एक भी नहीं हे ऐसा अनुभव से सिद्ध हे, अतएव यह न एक है, न सत्‌ है, न असत्‌ है ओर न सत्‌असत्‌ है हे व्याध इस प्रकार मैंने तुमसे सब कुछ कह दिया, निरन्तर सदुपदेशों से तुम्हे बोधित किया हे । तुम भी स्वयं ज्ञानवान्‌ हो सब कुछ जानते हो, इसलिए जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो