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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 150

30 verse-groups

  1. Verse 1जैसे जलकणों की लहरें, मेघ और दिग्‌भ्रम होने पर दिशाएँ ये सब अनन्य होते हुए भी चिरकाल तक न…
  2. Verses 2–4मुनि ने कहा : हे सदाचार मेँ स्पृहा रखनेवाले, हे साधो व्याध, उसके पश्चात्‌ उस प्राणी के हृ…
  3. Verses 5–10इसके बाद किसी समय महातपस्वी आत्मज्ञानी मननशील कोई संमान्य विद्वान अतिथि के रूप में मेरे घ…
  4. Verse 11मेरा यह प्रश्न सुनकर, मेरी ओर देखकर, विचारकर मुस्करा रहे उन मुनि महाराज ने अन्यमनस्क से ह…
  5. Verse 12समागत अन्य मुनि ने कहा : हे साधुवर, अन्तःकरण के यह चित्‌ है, यह अचित्‌ है, ऐसे विवेक से स…
  6. Verse 13उक्त विषय में विवेक की सामर्थ्य न होने से मुझे चुप हुए देखकर उन मुनि महाराज ने पूर्वजन्मो…
  7. Verse 14हे मुने, अलीक (मिथ्या) यह सब केवल स्वप्नमात्र का भान है ऐसा आप क्यों नहीं जानते, क्योकि म…
  8. Verse 15यह जगत्‌ निराकार, नामरहित, आदिरहित, कल्पनाशून्य चिन्मात्ररूप काँच की चमक रूप से (जगमग रूप…
  9. Verse 16सहज चिन्मात्ररूप स्वाध्यस्त में वेदनानुसार सत्त्वादि का निर्वाहक है, ऐसा कहते है । सर्वव्…
  10. Verse 17इसीलिए सव वस्तुएँ सकारण हैं अथवा अकारण हैं इत्यादि वादों की भी उसकी कल्पना के अनुसार ही व…
  11. Verse 18समष्टि व्यष्टिभाव की कल्पना ही हमारे चित्‌ के अधीन है, ऐसा कहते हैं। जिस प्राणी के हृदयवर…
  12. Verse 19इस प्राणी के समान दूसरा भी प्राणी अन्य प्रजाओं का विराट आत्मा होगा ऐसी संभावना होती है। उ…
  13. Verses 20–21सब लोगों के दुर्भिक्ष, अनावृष्टि आदि सर्वसाधारण दुःख तो जो जिसका स्थूल समष्टिरूप विराट है…
  14. Verse 22उन प्राणियों का एक ही समय में परिपाक को प्राप्त हुआ दुष्ट कर्म भी उसमें है, ऐसा कहते हैं।…
  15. Verse 23वैसा कर्म यदि चिति से ही पहले कल्पित होता है, तो चिति उक्त कर्मफलभागिनी होती है अन्यथा नह…
  16. Verse 24जहाँ पर जो जो कल्पना थोड़ी या घनी जेसी उदित होती है वहाँ वह वह कल्पना वैसी ही सहेतुककी कल…
  17. Verse 25केवल सहेतुक मानने से ही स्वप्न में घड़े आदि की सहेतुकता नहीं हो जाती इसलिए निर्हेतुक जगत्…
  18. Verse 26यह स्वप्नभ्रम कोई तो बिना कारण के ही प्रतीत होता है चूँकि सत्‌ असत्‌ रूप है, अतएव शून्य (…
  19. Verse 27यह विस्तृत जगत्‌ चित्‌ या स्वप्न से भिन्न नहीं है
  20. Verse 28यहाँ जिसकी सकारण रूप से प्रसिद्धि है वह सकारण कहा जाता है ओर जो अकारण रूप से प्रसिद्ध है…
  21. Verse 29स्वप्न में कार्य-कारणरूप क्रम से उदित वस्तु केवल चिति का भान ही हे ऐसा निर्णय जाग्रतनामक…
  22. Verse 30यदि कोई शंका करे कि सत्य ब्रह्म ही सब पदार्थो का कारण हो, सत्य कारण से उत्पन्न होने के का…
  23. Verses 31–34तथा पृथिवी आदि घनपिण्डरूप सृष्टि का क्या कारण है ? अविद्या का क्या कारण है और ब्रह्म का क…
  24. Verses 35–36इससे सिद्ध हुआ कि सकल सृष्टियाँ अकारण और भ्रमरूप है, ऐसा कहते हैं। जगत्‌ में सकल सृष्टिया…
  25. Verse 37प्रथम कल्पना में जिस पदार्थ की जैसी कल्पना की जाती है वह वैसा शरीर धारण करता है वही नियति…
  26. Verse 38जिस जिस भानरूप स्वरूप का सृष्टि के अनुकूल हिरण्यगर्भ की चिति ने पहले चित्‌ में ही अपने आप…
  27. Verse 39आदि कल्पना को उलटना महान्‌ पुरुषों के महान्‌ प्रयत्नो से कदाचित्‌ हो सकता है, ऐसा कहते है…
  28. Verse 40कहीं पर जैसे कि दूध आदि में दधिभाव की प्राप्ति के लिए जमावन, समय, गर्मी आदि कारण की कल्पन…
  29. Verse 41अज्ञानवश विस्मृत यह जगत्‌ असत्‌ होता हुआ ही पहले आँधी के बवंडर की तरह प्रकाश में आया। जैस…
  30. Verses 42–57जो मैने महामुनि से यह पूछा था कि क्या ये सब लोग एकसाथ ही अशुभ कर्म करते हैं ? इसी का उत्त…