Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 150
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- Verse 1जैसे जलकणों की लहरें, मेघ और दिग्भ्रम होने पर दिशाएँ ये सब अनन्य होते हुए भी चिरकाल तक न…
- Verses 2–4मुनि ने कहा : हे सदाचार मेँ स्पृहा रखनेवाले, हे साधो व्याध, उसके पश्चात् उस प्राणी के हृ…
- Verses 5–10इसके बाद किसी समय महातपस्वी आत्मज्ञानी मननशील कोई संमान्य विद्वान अतिथि के रूप में मेरे घ…
- Verse 11मेरा यह प्रश्न सुनकर, मेरी ओर देखकर, विचारकर मुस्करा रहे उन मुनि महाराज ने अन्यमनस्क से ह…
- Verse 12समागत अन्य मुनि ने कहा : हे साधुवर, अन्तःकरण के यह चित् है, यह अचित् है, ऐसे विवेक से स…
- Verse 13उक्त विषय में विवेक की सामर्थ्य न होने से मुझे चुप हुए देखकर उन मुनि महाराज ने पूर्वजन्मो…
- Verse 14हे मुने, अलीक (मिथ्या) यह सब केवल स्वप्नमात्र का भान है ऐसा आप क्यों नहीं जानते, क्योकि म…
- Verse 15यह जगत् निराकार, नामरहित, आदिरहित, कल्पनाशून्य चिन्मात्ररूप काँच की चमक रूप से (जगमग रूप…
- Verse 16सहज चिन्मात्ररूप स्वाध्यस्त में वेदनानुसार सत्त्वादि का निर्वाहक है, ऐसा कहते है । सर्वव्…
- Verse 17इसीलिए सव वस्तुएँ सकारण हैं अथवा अकारण हैं इत्यादि वादों की भी उसकी कल्पना के अनुसार ही व…
- Verse 18समष्टि व्यष्टिभाव की कल्पना ही हमारे चित् के अधीन है, ऐसा कहते हैं। जिस प्राणी के हृदयवर…
- Verse 19इस प्राणी के समान दूसरा भी प्राणी अन्य प्रजाओं का विराट आत्मा होगा ऐसी संभावना होती है। उ…
- Verses 20–21सब लोगों के दुर्भिक्ष, अनावृष्टि आदि सर्वसाधारण दुःख तो जो जिसका स्थूल समष्टिरूप विराट है…
- Verse 22उन प्राणियों का एक ही समय में परिपाक को प्राप्त हुआ दुष्ट कर्म भी उसमें है, ऐसा कहते हैं।…
- Verse 23वैसा कर्म यदि चिति से ही पहले कल्पित होता है, तो चिति उक्त कर्मफलभागिनी होती है अन्यथा नह…
- Verse 24जहाँ पर जो जो कल्पना थोड़ी या घनी जेसी उदित होती है वहाँ वह वह कल्पना वैसी ही सहेतुककी कल…
- Verse 25केवल सहेतुक मानने से ही स्वप्न में घड़े आदि की सहेतुकता नहीं हो जाती इसलिए निर्हेतुक जगत्…
- Verse 26यह स्वप्नभ्रम कोई तो बिना कारण के ही प्रतीत होता है चूँकि सत् असत् रूप है, अतएव शून्य (…
- Verse 27यह विस्तृत जगत् चित् या स्वप्न से भिन्न नहीं है
- Verse 28यहाँ जिसकी सकारण रूप से प्रसिद्धि है वह सकारण कहा जाता है ओर जो अकारण रूप से प्रसिद्ध है…
- Verse 29स्वप्न में कार्य-कारणरूप क्रम से उदित वस्तु केवल चिति का भान ही हे ऐसा निर्णय जाग्रतनामक…
- Verse 30यदि कोई शंका करे कि सत्य ब्रह्म ही सब पदार्थो का कारण हो, सत्य कारण से उत्पन्न होने के का…
- Verses 31–34तथा पृथिवी आदि घनपिण्डरूप सृष्टि का क्या कारण है ? अविद्या का क्या कारण है और ब्रह्म का क…
- Verses 35–36इससे सिद्ध हुआ कि सकल सृष्टियाँ अकारण और भ्रमरूप है, ऐसा कहते हैं। जगत् में सकल सृष्टिया…
- Verse 37प्रथम कल्पना में जिस पदार्थ की जैसी कल्पना की जाती है वह वैसा शरीर धारण करता है वही नियति…
- Verse 38जिस जिस भानरूप स्वरूप का सृष्टि के अनुकूल हिरण्यगर्भ की चिति ने पहले चित् में ही अपने आप…
- Verse 39आदि कल्पना को उलटना महान् पुरुषों के महान् प्रयत्नो से कदाचित् हो सकता है, ऐसा कहते है…
- Verse 40कहीं पर जैसे कि दूध आदि में दधिभाव की प्राप्ति के लिए जमावन, समय, गर्मी आदि कारण की कल्पन…
- Verse 41अज्ञानवश विस्मृत यह जगत् असत् होता हुआ ही पहले आँधी के बवंडर की तरह प्रकाश में आया। जैस…
- Verses 42–57जो मैने महामुनि से यह पूछा था कि क्या ये सब लोग एकसाथ ही अशुभ कर्म करते हैं ? इसी का उत्त…