Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verses 5–10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, verses 5–10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 5-10
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
इसके बाद किसी समय महातपस्वी आत्मज्ञानी
मननशील कोई संमान्य विद्वान अतिथि के रूप में मेरे घर पधारे । मैंने उनका खूब आदर सत्कार
किया, उससे प्रसन्न होकर उन्होने भोजन किया ओर तदनन्तर आराम किया मैंने बहुत से लोगों के
तुल्य सुखदुःख के क्रम का विचार कर उनसे यह पूछा : हे भगवन्, चूँकि आप महाज्ञानी है, जगत्
की सब गतिविधियाँ जानते हैं, क्रोध का तो आपमें नामनिशान भी नहीं है तथा विषयसुख-लेश में
आपकी तनिक भी आसक्ति नहीं हे । जैसे शरद् ऋतु में फलार्थी किसानों को धान आदि अन्न प्राप्त
होते हैं, वैसे ही कर्मशाली जीवों के शुभ अशुभ कर्मों से सुख और दुःख प्राप्त होते हैं | तो क्या ये
सभी लोग साथ ही अशुभ कर्म करते हैं जिससे कि इन सबके भक्ष्य और अभक्ष्यों को हड़प जानेवाले
दुर्भिक्ष आदि दोष साथ ही आते हैं ? दुर्भिक्ष, अनावृष्टि, उल्कापात आदि उपद्रव, जो सब भक्ष्य,
अभक्ष्य आदि को हडप जाते हैं, सब लोगों के साथ ही होते हैं, तो क्या संपूर्ण जनराशि का समान ही
दुष्कर्म फलित होता है