Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, Verses 20–21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 150, verses 20–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 150 · श्लोक 20,21
संस्कृत श्लोक
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हिन्दी अर्थ
सब लोगों के दुर्भिक्ष, अनावृष्टि आदि सर्वसाधारण दुःख तो जो जिसका स्थूल समष्टिरूप विराट
है उसका धातुविकार भेद ही निमित्त है, ऐसा कहते हैं।
विराट के विषम स्पन्द आदिवाले धातुविकार से विराट के अंग के अवयवरूप इस जनसमूह का
समान दुर्भिक्ष, अनावृष्टि ओर प्रलय आता है अथवा शान्त होता है, क्योकि विराट् की जो सत्ता है वही
इस सर्ग की सर्गता हे