Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 141
एक सौ उनतालीसवाँ सर्ग समाप्त एक सौ चालीसवाँ सर्ग प्रलय-सागर हटना, गाँव में मुनि की ब्रह्माण्डरूप से स्थिति, प्राणी के शरीर से बाहर निकलना आदि वर्णन ।
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- Verse 1व्याध ने कहा : महामुने, ज्ञानयोग सिद्ध आपके सदृश पुरुष भी पूर्ववर्णित नाना प्रकार की प्रल…
- Verse 2महामुनि ने कहा : हे व्याध, आकाश में भ्रान्तिज्ञानरूप ये सकल जगत् कल्पान्त मे भ्रान्तिरूप…
- Verses 3–4क्रमिक प्रलय में योग द्वारा भूत और भावी पदार्थो के पयालोचनका अवसर रहता है, किन्तु आकस्मिक…
- Verses 5–6अथवा काल की प्रबलतावश उस समय मेरी ध्यान-धारणा फुरित नहीं हुई, ऐसा कहते हैं। हे वनाधिपति व…
- Verse 7दूसरी बात यह भी है कि स्वप्न में अन्य के चित्त का अनुगमन करते मैंने यह सब देखा था, स्वप्न…
- Verse 8व्याध ने कहा : प्रभो, यह यदि असत् है, केवल स्वप्नदृष्ट भ्रान्तिरूप ही है तो हे कल्याणो क…
- Verses 9–23कल्यार्णो के विशेषज्ञ आपमें निरर्थक वाक्यवक्तृता का सम्भव नहीं है, यह सूचित करने के लिए “…
- Verses 24–32इसके पश्चात् तटवर्ती पर्वत के शिखर पर पहुँचकर थक जाने के कारण किसी मुनि के आश्रम में जब…
- Verses 33–44उसके बाद समय बीतने पर धीरे-धीरे मेरी पूर्वजन्म की बोधबुद्धिविस्मृत हो गई । जैसे पूर्ववर्ण…
- Verses 45–51अपने पूर्ववृत्त की याद आने के पश्चात् जिसके पेट में बैठा था, उस प्राणी को सकल जगत् की अ…
- Verse 52मेरी रक्षा करने में तत्पर मेरे सामने बैठे हुए शिष्यं का केवल एक मुहूर्तं ही समय बीता था
- Verse 53जिस प्राणी के हृदय में में प्रविष्ट हुआ था वह भी किसी उत्सव में प्राप्त हुए अन्न से तृप्त…
- Verse 54वह आश्चर्य देखकर मैंने किसी से कुछ नहीं कहा । कौतुकवश मैं पुनः उसी के दृश्य में प्रविष्ट…
- Verses 55–65मैं पूर्ववासना से युक्त होकर उन स्ववन्धुओं को देखने के लिए उस प्राणी के हृदय के अन्दर पूर…