Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verses 45–51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, verses 45–51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 45-51
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
अपने पूर्ववृत्त की याद आने के पश्चात् जिसके पेट में बैठा था, उस प्राणी
को सकल जगत् की अपेक्षा वृद्ध होने के कारण विराट्रूप समझकर मैने उसके उदर से बाहर
निकलने का उद्योग किया प्राणी के उदर में भूमि, सागर, पर्वत और नदियों से पूर्ण विस्तीर्ण भुवन
में जब मुझे बाहर निकलने के लिए द्वारभूत उसके मुँह का पता नहीं लगा, तब तो मैं बन्धु-बान्धवों
से पूर्ण उस प्रदेश का परित्याग न करते हुए बाहर निकलने के लिए उसके प्राणवायु में प्रविष्ट हुआ।
यहाँपर स्थित विराट्रूप इस प्राणी का बाह्य दृश्य और अन्य विराट् में उत्पन्न आभ्यन्तर दृश्य सब
मैं देख, इस बुद्धि से तदनुकूल उसके प्राणों मेँ अहंभाव धारणा बाँधकर मैंने उस देश का त्याग
किया । जैसे फूलों से सुगन्धि वायु के साथ बाहर निकलती है वैसे ही मैं उसके प्राणों के साथ बाहर
निकला, पवन के कन्धेपर सवार होकर उसके मुख द्वारपर आकर वायुरूपी रथ से बाहर आया, बाहर
आकर मैने यह बातें देखीं । कहीं पर्वत-गुफा में शिष्यो से संरक्षित मुनि का आश्रम है, वर्हपर
पद्मासन लगाया हुआ मेरा शरीर पहले की तरह ही ज्यों का त्यों वेठा हे