Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verses 9–23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, verses 9–23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 9-23
संस्कृत श्लोक
अलातविद्युतो धुन्वन्पूताङ्गारोग्रमण्डलीः ।
धूमान्धकारैः स्थगयन्म्लानमूर्ध्वदिशोमुखम् ॥ ९ ॥
भूमेर्व्योम्नो दिङ्मुखेभ्यः समन्ताज्ज्वालासंध्यावारिदा निर्गतास्ते ।
यैस्तैर्ज्वालाशैलसंपिण्डमात्रं सव्योमौकाः संस्थिता सप्तलोकी ॥ १० ॥
क्वापि प्रोत्फालकीर्णानलकणकपिलप्रोल्लसन्मूर्धजालिः क्वापि प्रोड्डीनकुड्यः कटुरटनपटुर्भस्मसंपिण्डपाण्डुः ।
क्वापि ज्वालापटालीं परिदधदभितः संपतन्तीं गृहीतां रौद्रः कर्तुं प्रवृत्तो हर इव स तदा मारुतो नृत्यलीलाः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
कल्यार्णो के विशेषज्ञ आपमें निरर्थक वाक्यवक्तृता का सम्भव नहीं है, यह सूचित करने के लिए
“कल्याणकोविद' सम्बोधन दिया है। अपनी कल्याण विशेषता प्रकट करते हुए मुनि उत्तर देते हैं।
हे मतिमन्, यह मेरा स्वप्नदृष्ट-वर्णन निष्फल नहीं है, इसमें तुमको बोधित करना महान्
प्रयोजन है । जिससे कि वर्णित स्वप्नप्रपंच की तुलना से तुम परिदृश्यमान प्रपंच को भी केवल
भ्रमरूप समझो । दृश्यमात्र में भ्रमत्व सिद्ध हो जानेपर दृक्स्वरूप इस कथांश को तुम मुझसे सुनो ।
इसके वाद पागल जैसे उस एकमात्र सागर के वेग में उक्त प्राणी के ओज में पैठे हुए भ्रम-परम्पराओं
से परिपूर्ण मैंने स्वप्न में भ्रान्ति देखी । जव वह सारा का सारा प्रलयजल कुपित वज से भयभीत हुए
पंखवाले महापर्वतों के समूह की तरह कहीं जाने के लिए तैयार हुआ तब प्रलयजलराशि में उतरा
रहे मुझे भाग्यवश पर्वतशिखर के छोर की तरह एक तट मिला | मैं उसके सहारे ठहर गया । इसके
उपरान्त एक क्षण में वह सारी प्रलयराशि, जिसने लहरों की चोटियों के छितराये हुए जलकणों के
सदुश नक्षत्र आदि देवताओं से आकाश को तारकित (तारों से पटा हुआ) बना डाला था, जो
प्रवाहवश पाताल में पहुँचे हुए कुछ तारों से मणिमय गर्भवालीसी लगती थी, भँवरों में पड़कर
अधोमुख हए पर्वतीय पुराने तृणों से प्रचरता को प्राप्त हुई थी, सुवर्णद्वीप के तुल्य विशाल देवनगर
ओर मन्दिरं से व्याप्त थी, यहाँ-वहाँ उतरा रही देवांगनारूप छिपी हुई कमलराशि से मायायुक्त
थी, जिसके बीच मेँ प्रलयकालीन मेघ के समान काला सेवाल का अम्बार इधर से उधर चक्कर लगा
रहा था, जो बिजलीरूपी गोरोचनासदृश परागवाले प्रलयकालीन मेघरूप नीलकमलों से भरी-पुरी
थी, जिसके चौगिर्द जलकणों की जडी लगा रहे कुहरे, मेघ और पहाड़ों ने तट बना डाला था, जिसमें
आकाश का स्पर्श करनेवाली चंचल ऊँची-ऊँची लहरों में कल्पवृक्षो के बहने का सन्देह होता था,
सम्पूर्णतया कहीं चली गई । इसके पश्चात् वह एकमात्र सागर का सोचा केवल सूखा गड्ढा रह गया ।
उसमें कहींपर सह्याचल गला पडा हुआ था, कहींपर जीर्णशीर्णं हो जाने के कारण यह मन्दराचल
है या अन्य कोई दूसरा पर्वत है, यों मन्दराद्रि संशययोग्य अवस्था में पड़ा था, कहींपर चन्द्रमा, यम,
इन्द्र ओर तक्षक कीचड़ में आकण्ठ डूबे थे, कहींपर कल्पवृक्षो के समूह की नीचे की शाखाएँ कीचड़
में डूबी थीं, कहींपर लोकपालों के सिर ओर हाथ कमलो की तरह बिखरे थे, कर्हीपर कमलो की तरह
विश्राम ले रहे खून के तालाबों से वह लाल था, कहींपर आकण्ठ कीचड़ में डूबी हुई विद्याधरियाँ
कराह रही थीं, कहींपर मानों स्वप्न में मरे हुए हाथी जैसे विशालकाय यमवाहनरूप भीषण भैसों से
घिरा था, कहींपर महाकाय गरुड़रूप सुमेरु पर्वत अवसाद को प्राप्त होकर पड़ा था, कहींपर उसमें
भूमिपर पड़े हुए यम के दण्ड से अकिचिंत्कर (मत्त की नाई जल के निरोध में असमर्थ) महासेतु
बना था, कहींपर मरे हुए ब्रह्मा के वाहनभूत हंस से पंकमय भूमि मन्दहास युक्त-सी लगती थी,
कहींपर देवराज इन्द्र के एेरावत का आधा शरीर कीचड़ में फसा था