Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verses 55–65
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, verses 55–65 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 55-65
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
मैं पूर्ववासना से युक्त होकर उन स्ववन्धुओं को देखने के लिए उस
प्राणी के हृदय के अन्दर पूर्व अनुभूत ओजःप्रदेश मेँ जब पहुँचा, तब तक वहाँ अति भीषण युगान्त
(प्रलय) हो चुका था, उक्त भुवन धर्मअधर्ममर्यादा के साथ सर्वथा बदल गया था । अब वहाँ पर पहले
से विलक्षण ही पर्वत खड़े थे, पहले से विलक्षण पृथिवी थी, दिशाएँ भी दूसरी थीं, लोक की बनावट
में भी अन्तर हो गया था वे मेरे बन्धु-वान्धव, वह गाँव, वह भूमिखण्ड, वे दिकृतट, सबके सब वायु
द्वारा बटोर कर उड़ाये गये से न मालूम कहाँ लीन हो गये थे । मैने उस समय सारे भुवन को पहले
से विलक्षण स्थिति में देखा, उसके सब अवयव अपूर्वं थे मानों वहाँपर वह पूर्वं जगत् के स्थान में
दूसरा ही जगत् उदित हुआ था । वहाँपर बारह सूर्य तपते थे, दसो दिशाएँ जलती थीं, दण्डक से
जमे हुए जल की तरह सबके सब पर्वत बलात् गलने की तैयारी में थे । प्रत्येक पहाड़ पर प्रत्येक दिशा
में वनपंक्तिर्यो जलती थीं, समस्त मणि, रत्न आदि सम्पत्तियाँ जलकर राख हो गई थीं । उनकी
केवल स्मृति ही शेष रह गई थी । सभी सागर सूख गये थे, ओंधिर्यो सामने की ओर उठी थीं, सम्पूर्ण
भूमिमण्डल अगारों का ढेर बन गया था । पहले पाताल से, उसके बाद भूमिमण्डल से, फिर दिशाओं
से ज्वालाएँ निकलने लगीं, शीघ्र ही सारा विश्व एक ही ज्वालामय मण्डल बनकर सन्ध्या समय के
मेघो की तरह लाल हो गया । सुवर्ण-कमल के अन्दर प्रविष्ट हुए भंग के समान उस ज्वालामय घर
के अन्दर प्रविष्ट हुए मुझे फतींगे की तरह यद्यपि देह प्राप्त था, फिर भी दाह विकार दुःख नहीं हुआ,
क्योकि मेरा शरीर केवल आतिवाहिक है ऐसा मेरा दृढ निश्चय था । वायु की धारणा से वायुरूप बना
हुआ मैं उस ज्वालामय प्रलय जलप्रवाह में बिजली की तरह बखूबी घूमता था । ज्वालाओं की धधकों
में चंचल शरीर होकर मैंने स्थलकमलोंपर घूम रहे भँवरों के तुल्य शोभा धारण की