Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, Verses 33–44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 141, verses 33–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 141 · श्लोक 33-44
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उसके बाद समय बीतने पर धीरे-धीरे मेरी पूर्वजन्म की बोधबुद्धिविस्मृत हो गई । जैसे पूर्ववर्णित
दामव्यालकटाख्यान में वासनाशून्य कटकी-मछलियों के साथ सहवास का अभ्यास होने से-
पूर्वबोधविस्मृति द्वारा मत्स्यता हो गई थी वैसे ही मेरी भी ग्रामवास्तव्यता सम्पन्न हो गई । इस प्रकार
उस समय मेँ ग्रामवासी ब्राह्मण बन गया । मेरी एकमात्र शरीर मे आसक्ति बद्धमूल हो गई । विवेक-
भूमि मुझसे कोसों दूर चली गई । मैं केवल शरीर को आत्मा समझता था, केवल स्त्री ही मेरे मनोरंजन
की सामग्री थी, केवल वासना ही मेरा स्वभाव था और केवल धन के उपार्जन में ही मैं जी-जान से
लगा रहता था । एकमात्र बूढ़ी गाय ही मेरी सम्पत्ति थी, घर के आँगन में छाया के लिए मैने सेम की
लता लगा रक्खी थी, अम्निहोत्रार्थ अग्नि, जीविकार्थं दो एक बीधा खेत और गौ आदि पशु मैंने जोड़
रक्खे थे, धातुओं की वस्तुओं में एकमात्र कमण्डलु का मैंने उपार्जन किया था, स्वल्प काल तक
रहनेवाले तुलसी आदि के पेड़-पौधों में मेरा बड़ा प्रेम था | मैं सदा लोकाचार में (नगर-ग्राम के
आचार-विचारों में) निरत रहता था । घर के निकटवर्ती हरे-भरे मैदान में अकसर उठा-बैठा करता
था । प्रायः शाक और शाक से भरे बागों को सजाने-सँवारने में मेरे दिन बीतते थे छोटी-मोटी
नदियों, झीलों, गंगा आदि पुण्यनदियों, तीर्थो ओर तालाबों में स्नान करने के लिए मैं सदा तत्पर
रहता था । गोहरी, अन्न, जल, आग-लकड़ी ओर ईट-पत्थर का क्लेश से संचय करता था । यह
कर्तव्य है, यह अकर्तव्य है, इस प्रकार के जालो से जकड़ा था । इस प्रकार वहाँ जीवननिर्वाह कर
रहे मेरे सौ वर्ष बीत गये एक समय दूर से कोई आत्मज्ञानी अतिथि मेरे घर आया । मैंने बड़े
भक्तिभाव से उसका सत्कार किया । उसने स्नानकर मेरे घर में विश्राम किया और भोजन किया,
रात्रि के समय शय्यापर बैठकर उसने कथा कही । किसी कथाप्रसंग में, जो अनेक दिशाओं, देशो,
पर्वतो के रीति-रिवाजों से बड़ा मनोहर था तथा जिसमें अखण्ड चिन्मात्र ब्रह्म ही यथास्थित रहकर
भी जगत् के रूप से विकसित है, यों समझाया । इससे केवल एकमात्र बोधमयता को प्राप्त हुए मुझे
अपनी धारणा शक्ति से प्राणी के शरीर में प्रवेश करना आदि अपना पहले का सारा वृत्तान्त याद
हो आया