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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 133

7 verse-groups

  1. Verses 1–3एक सौ इकतीसर्वो सर्गं समाप्त एक सौ बत्तीसवाँ सर्ग भास द्वारा पुनः अपनी विविध जन्मभ्रान्ति…
  2. Verses 4–5तो नीद आने के पूर्व ही यह बात तुमने मुझको क्यो नहीं बतला दी, इसपर वह कहती है । आपके समागम…
  3. Verse 6उसके बाद दूसरे जन्म मे आश्वयपूर्ण जगत्‌ के अन्तदर्शनका वर्णन करता है । दूसरे जन्म में मैं…
  4. Verse 7तो वर्होपर लौकिक और वैदिक व्यवहार कैसे चलता था ? इस प्रश्नपर कहता है । उसके बाद मैंने अपन…
  5. Verse 8तदनन्तर दूसरे जन्म का वृत्त कहता है। समुद्र तीर के निकटवर्ती विद्याधर ओर देवताओं के विहार…
  6. Verses 9–10तदुपरान्त मैं अग्निदेव के वर के प्रभाव से जगत्‌ में चारों ओर अविद्या को देखने की इच्छा कर…
  7. Verses 11–30कहीं पर मे जगत्‌ से निकलकर एकमात्र महार्णव के समान विस्तृत आकाश में गिरा, वहाँपर निवास कर…