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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 133, Verses 11–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 133, verses 11–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 133 · श्लोक 11-20

संस्कृत श्लोक

इत्युक्तेनाग्निना प्रोक्तं मा भैषीरिति तत्पुनः । उत्तिष्ठागच्छ गच्छावो मल्लोकमिति चानघ ॥ ११ ॥ इत्युक्त्वा शुकपृष्ठेऽसावारोप्य भगवांस्ततः । देहैकदेशे तत्पाति भूतं दग्ध्वा नभः प्लुतः ॥ १२ ॥ अनन्तरं नभः प्राप्य दृष्टः कष्टाकृतिर्मया । स तादृग्भूतसंपातमहोत्पातो भयप्रदः ॥ १३ ॥ तस्मिन्जवेन पतिते वसुधा चचाल साम्भोधिशैलवनपत्तनजङ्गलौघा । चक्रे भृगुद्वयमयानजलस्रवन्ती भीमाकृतीन्व्यधुरदेहविभेदगर्तान् ॥ १४ ॥ उर्वी ररास ककुबुत्तरतो ररास पूर्वा ररास विररास च दक्षिणा दिक् । द्यौराररास विररास सशैलभूतं सर्वं जगत्प्रलयसंभ्रमभीतमुच्चैः ॥ १५ ॥ उर्वी ररास धरणे सविरावरंहःसंरम्भतर्जितसमस्तदिगन्तरासा । व्योमापि घुंघुममलङ्घ्यमलं चकार नागारिवृन्दभयविद्रवणप्रचण्डम् ॥ १६ ॥ निर्घातशब्द उदभूदभितो भयाय भीमाय भूधरदरीदृढदारणोत्थः । उत्पातभीमजवजालयुगान्तवातसंरब्धकल्पघनघोषवितीर्णतर्जः ॥ १७ ॥ तस्मिञ्जवेन पतिते वसुधा ररास सारावदिंमुखतया शतवेधमागात् । तत्रास्फुटन्कुलगिरीन्द्रमहातटानि पातालदेशमविशन्हिमवच्छिरांसि ॥ १८ ॥ आसीत्तत्पतनं तस्य मेरुशैलशिलाकृतेः । दलनं शैलश्रृङ्गाणां विदारणकरं भुवः ॥ १९ ॥ क्षोभणं जलराशीनामद्रीणां भूतलार्पणम् । पीडनं सर्वभूतानां क्रीडनं प्रलयार्थिनाम् ॥ २० ॥ पातनं भूतले भानोः स्थगनं द्वीपपद्धतेः । चूर्णीकरणमद्रीणां दलनं मण्डलावनेः ॥ २१ ॥ द्वितीयमिव भूपीठं ब्रह्माण्डार्धमिवापरम् । पतितं खमिवाकृत्या तदपश्यन्नभश्चराः ॥ २२ ॥ अथ पश्याम्यहं यावदसौ मांसमयोऽचलः । न माति सप्तद्वीपायां भुवि तस्याङ्गमेककम् ॥ २३ ॥ तमालोक्य मया देवः प्रसादे समवस्थितः । संपृष्टो भगवान्वह्निः प्रभो किमिदमित्यथ ॥ २४ ॥ कथं मांसमयः सार्धं स चार्कः पतितो दिवः । स न माति हि भूपीठे सपर्वतवनाम्बुधौ ॥ २५ ॥ अग्निरुवाच । प्रतिपालय पुत्र त्वं क्षणमेकं गतत्वरः । यावच्छाम्यतु दोषोऽयं कथयिष्यामि ते ततः ॥ २६ ॥ अथ तस्मिन्वदत्येवं समाजग्मुर्नभश्चराः । तज्जगज्जालजातीया दिग्भ्यो गगनजाखिलाः ॥ २७ ॥ सिद्धसाध्याप्सरोदैत्यगन्धर्वोरगकिन्नराः । ऋषयो मुनयो यक्षाः पितरो मातरोऽमराः ॥ २८ ॥ अथ सर्वेश्वरीं देवीं शरण्यां ते नभश्चराः । भक्तिनम्रशिरःकायाः कालरात्रिं प्रतुष्टुवुः ॥ २९ ॥ नभश्चरा ऊचुः । बद्ध्वा खट्वाङ्गश्रृङ्गे कपिलमुरुजटामण्डलं पद्मयोनेः कृत्वा दैत्योत्तमाङ्गैः स्रजमुरसि शिरःशेखरं तार्क्ष्यपक्षैः । या देवी भुक्तविश्वा पिबति जगदिदं साद्रिभू पीठभूतं सा देवी निष्कलङ्का कलिततनुलता पातु नः पालनीयान् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

कहीं पर मे जगत्‌ से निकलकर एकमात्र महार्णव के समान विस्तृत आकाश में गिरा, वहाँपर निवास करनेवालों के तुल्य नक्षत्रसमूह में बँधकर मेने दिन, रात, मास, ऋतु आदि समय का अनुभव किया तथा दिशाओं में पतन का (गमन का) भी अनुभव किया । पूर्वोक्त प्रकार से आकाशकोश में गमन का अनुभव करना ही मेरी एकमात्र वृत्ति थी तथा चिरकाल के गमन से मैं थक कर चूर हो गया था, अतएव इसके वाद निद्रा देवी ने मेरे हृदयपर अड्डा जमाया । उस प्रकार के यानी सब लोगों में प्रसिद्ध सुषुप्त शरीर को लेकर स्थित हुए मुझे इसके बाद स्वप्नात्मक जाग्रत में अपने अन्दर ही सारा विश्व प्राप्त हुआ | वहाँ पर भी पुनः दिगन्त, भुवन आदि गमनवश प्राप्त हुई चंचलता से मैं वैसे ही चंचल बनाया गया जैसे कि जिसमें वायु का वेग क्षीण न हुआ हो उस लता द्वारा पक्षी चंचल बनाया जाता हे । उक्त चंचलता को प्राप्त हुआ मैं पूर्वं संकल्पित दृश्य परिच्छेदरूप जगद्गुफाओं में गिरा | चक्षु जहोँ तक विषयाशा विस्तृत है वहाँतक मैं एक क्षण में चला गया । फिर उसी प्रकार देखता हुआ विषयदर्शन के कोतुक से फिर दृश्य को प्राप्त हुआ । इस प्रकार जाग्रत अवस्था मेँ ओर स्वप्नावस्था में दृश्य और अदृश्य विषय के उदेश्य से गम्य ओर अगम्य देश को वेग से लाँघ रहे मेरे बहुत वर्ष बीत गये । किन्तु दृश्यनामक अविद्या का अन्त मुझे वैसे ही नहीं मिला जैसे कि मिथ्या ही हृदय में जमी हुई पिशाची का अन्त बालक को प्राप्त नहीं होता है । यद्यपि वह सत्‌ नहीं है, यह सत्‌ नहीं है इस प्रकार के विचारानुभव में मैं स्थिर रहा तथापि यह सत्य है, यह असत्य है, यों प्रत्येक विषय में मेरी दुर्दृष्टि निवृत्त नहीं हुई, क्योकि चिरकाल से अभ्यस्त द्वैतसत्यता का मेरा संस्कार प्रबल था। यद्यपि मैं विचार से दुर्दृष्टियों का निवारण करने का यत्न करता था फिर भी वे प्रतिक्षण प्राप्त हुए सुख, दुख,भिन्नदेश, भिन्न काल तथा इष्ट ओर अनिष्ट लोगों के समागमो से नदियों के जल की भाँति नई नई आ जाती हैं और चली जाती हैँ । ताड, तमाल, मौलसिरी आदि से अनुपम उन्नत एक शिखर की मुझे याद आ रही है, उसमें वायु का वेग खूब साँय-साँय शब्द करता है । यद्यपि वह सूर्य आदि से रहित है तथापि अपनी कान्ति से जगमगाता है । सारा का सारा विश्व उस श्रंग के स्थावर ओर जंगम पर्वत तटों से युक्त चोटी स्थानीय है यानी सर्वाधिष्ठान ब्रह्म ही यहा पर आश्चर्य श्रंग कहा गया है जो यह शिखर एकान्त में विहार करनेवाले तत्त्वज्ञानियों के मन को हरनेवाला, स्वच्छन्द एक तथा विकार की शंका से परे हे, त्रिविध परिच्छेद से शून्य है, उसे मैंने वहीं सुन्दर जगतों में (ब्रह्मवित्‌मण्डलियों में) देखा । देवराज इन्द्र की और ब्रह्मा की लक्ष्मी भी उसकी बराबरी नहीं कर सकती