Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 133, Verses 4–5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 133, verses 4–5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 133 · श्लोक 4,5
संस्कृत श्लोक
आश्चर्यमात्रमुचितं किमिदं निमेषादित्यक्षि वै जगति यावदहं त्यजामि ।
खात्तावदद्रिमतुलं पुरुषाकृतिं द्रागावर्तवृत्तिभिरपश्यमहं पतन्तम् ॥ ४ ॥
कः स्यादयं गिरिगुरुः पुरुषो विराड्वा पर्यस्तपर्वतवदाशु पतच्छरीरः ।
आकाशपूरकवपुः परमाम्बरोऽपि यो नैव भाति पिहिताखिलवासरश्रीः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
तो नीद आने के पूर्व ही यह बात तुमने मुझको क्यो नहीं बतला दी, इसपर वह कहती है ।
आपके समागमजनित आनन्दातिरेक से मैं आपसे यह कहना भूल गई । यह कह कर जैसे पर्वत के
शिखर पर गंगा के स्वर्णकमल में बैठी हुई वरी अपने सहचर भ्रमर को लेकर उड़ती है वैसे ही वह मुझे
लेकर आकाश में उड़ गई । उस जल से पीडित हुआ मैं तदनन्तर सात वर्षतक उसके साथ कीचड़ के
स्पर्शं से रहित निर्मल मन्दराचल के शिखर पर रहा