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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 123

एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ एक सौ बाईसवाँ सर्ग सागर के तरंगों में पैरों से चल रहे विपश्चित्‌ तरंगरूपी मगरों को चीरकर समुद्र पार गये, यह वर्णन।

17 verse-groups

  1. Verses 1–3श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, तदुपरान्त प्रातःकाल मन्त्रियों के न चाहने पर भी जबरदस्ती…
  2. Verse 4वे चारों विपश्चित्‌ रनेह की अधिकता से प्रत्येक दिशा में समुद्र में प्रवेश कर रहे बहुत से…
  3. Verse 5भूमितल के समान जल के अन्दर तरंगराशिया में भी पैर रखकर अकेले ही उद्यत हुए वे चारों विपश्चि…
  4. Verse 6चरणों के विन्यास से ही महासागर के अन्दर प्रविष्ट हुए उन्हें तट पर खड़े हुए लोगों ने तब तक…
  5. Verse 7दृदनिश्चय से पादगामी उन सभी ने उस समुद्र मार्ग को ऐसे पार किया जैसे हाथीवान से प्रेरित हा…
  6. Verses 8–9पर्वत के सदृश उतार ओर चढाव से ऊँची ओर जलतरंगों की शोभा को स्वयं भी उसका ग्रहण करने से, हर…
  7. Verse 10वे मन्त्र, विद्या, बल और तेजस्विता से दुर्जय थे तथा हाथ में शस्त्र लिए हुए थे, अतएव कहीं…
  8. Verse 11जलतरंगों में विश्राम ले रहे वायुओं से गेंद की तरह उछाले गये शरीरवाले वे एक ही क्षण में सौ…
  9. Verse 12जलतरंगरूपी हाथियों द्वारा की गई अपूर्वं चमत्कार कारिणी तुंगदेहता (उन्नतशरीरता) से वे अपने…
  10. Verse 13बड़ी विस्तृत तरंगराशिरूपी घटाओं को तोड़ने और उलटने में पटुताओं से, वायुओं से उद्दीपित बिज…
  11. Verse 14यद्यपि वे तैर रहे चंचल गजों की तरह तरंगराशिया से विघटित (धक्कामुक्की से पीडित) हुए थे तथा…
  12. Verse 15बड़ी-बड़ी लहरों में मोतियों और मणियों की राशियों में प्रतिबिम्बित हुए वे एकाकी होने पर भी…
  13. Verse 16के पिण्डों पर पैर रख रहे उन्होने सफेद कमलों पर चढ़े हुए राजहंसों की शोभा धारण की
  14. Verse 17मेघ के गर्जन की ध्वनि के सदृश भयंकर सागर के घुम-घुम शब्द से, जो कि तटभूमि में टकराने से औ…
  15. Verse 18आकाश को छूनेवाले जलमय पर्वतराजों के उछलने और गिरने से धक्कामुक्की मेँ पड़े हुए वे क्षणभर…
  16. Verse 19अचानक ऊपर गिरे हुए जलप्रवाहरूपी वस्त्र से ढके हुए वे उत्पातां की प्राप्ति होने पर गिर रहे…
  17. Verse 20विशाल मेघों से प्रकट और अप्रकट किरणराशिवाली घूम रही मणियों और मोतियों की राशियों से तथा ब…