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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, Verses 8–9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, verses 8–9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 8,9

संस्कृत श्लोक

तया मकरमातङ्गनिगीर्णोद्गीर्णमूर्तिमान् । अतिचक्राम सुबहून्द्वीपान्तरकुलाचलान् ॥ ८ ॥ पश्चिमः पृष्ठमारोप्य हेमचूडेन पक्षिणा । कुशद्वीपे कुशाङ्गश्रीस्तरसा तारतोऽर्णवान् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

पर्वत के सदृश उतार ओर चढाव से ऊँची ओर जलतरंगों की शोभा को स्वयं भी उसका ग्रहण करने से, हर रहे अतएव भगवान्‌ श्रीहरि की मूर्ति के तुल्य (7) मूर्तिवाले उन्होने मस्त मेघ-घटा में प्रविष्ट हुए चन्द्रमा के समान अपने प्रवेश से शोभायुक्त हुए आवर्तो में (जलभँवरों मे) किसी प्रकार के भय-विस्मय के विना चिरकाल तक तृणों के समान भ्रमण किया