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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, Verse 20

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, verse 20 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 20

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

विशाल मेघों से प्रकट और अप्रकट किरणराशिवाली घूम रही मणियों और मोतियों की राशियों से तथा बीच मेँ जलमय वृक्षलतातुल्य तरंगों के जलकणों से फूलों की तरह अपने शरीर को विभूषित कर रहे, बड़े- बड़े बली मगर और केकड़ों से व्याप्त तरंगों में चारों ओर से घिरे हुए तथा मगर ही हैं सहचर (मित्र) जिनके ऐसे वे विपश्चित्‌ समुद्र में पैरों से चले