Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, Verses 1–3

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 123, verses 1–3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 123 · श्लोक 1-3

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । इत्येते दृश्यरूपाया अविद्याया विचारणे । प्रवृत्ताः पादचारेण समुद्रद्वीपगामिनः ॥ १ ॥ अब्धेर्द्वीपं पुनर्द्वीपादब्धिं द्वीपं गिरिं वनम् । लाघवाल्लङ्घयामासुश्छेदभेदविवर्जिताः ॥ २ ॥ पीतो विपश्चित्पाश्चात्यो मीनेनामरमानिना । विष्णुमीनकुलोत्थेन वितस्तावाहनौजसा ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : श्रीरामजी, तदुपरान्त प्रातःकाल मन्त्रियों के न चाहने पर भी जबरदस्ती नीतिशास्त्र के अनुसार पृथिवी के राज्यविभाग, राज्य-परिपालन के उपायों का उपदेश, मयदिास्थापन आदि की भलीभाँति व्यवस्था कर दिगन्त के दर्शन की उत्कट उत्कण्ठा से ग्रह, भूत आदि के आवेश से युक्त तथा साक्षात्‌ निषेध न कर सक रहे श्रेष्ठ मन्त्रियों द्वारा इशारे से रोके जा रहे वे चारों विपश्चित्‌ रो रहे अतएव अश्रुपूर्णमुखो से युक्त सब परिजनों को निवृत्तकर, स्नेहशून्य होने के कारण अभिमान, डाह, लाभ, शत्रुओं के पराभव की इच्छा, राज्य, रत्री, पुत्र आदि की इच्छा का त्यागकर हम लोग समुद्रपार में दिगन्त को देखकर शीघ्र ही आते हैं यों परिजनों की तसल्ली के लिए कहते हुए गये । अग्निदेव की प्रसन्नता से प्राप्त मन्त्र की सामर्थ्य से ही भूमि, जल आदि भूतो पर विजय पाने से उत्तमता को (सिद्धता को) प्राप्त हुए उन्होने उस समय पैरों से ही समुद्र में प्रवेश किया

सर्ग सन्दर्भ

एक सौ इक्कीसवाँ सर्ग समाप्त बाईसवाँ एक सौ बाईसवाँ सर्ग सागर के तरंगों में पैरों से चल रहे विपश्चित्‌ तरंगरूपी मगरों को चीरकर समुद्र पार गये, यह वर्णन।