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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 91

11 verse-groups

  1. Verses 1–3नब्बेवाँ सर्गे समाप्त इक्यानबेवाँ इक्यानबेवाँ सर्ग तत््वज्ञानसम्पादक सर्वत्याग की सिद्धि…
  2. Verses 4–6हे राजन्‌, आप अत्यन्त शक्तिसम्पन्न हाथी के सदृश रहते हुए भी दुर्बल मूर्खतारूपी महावत के द…
  3. Verse 7“रिपौ हस्तिपके दूरादपशथ्यति स वारणः“ (दूरी के कारण न देख रहा उसका शत्रु महावत जब चिन्तन क…
  4. Verse 8दन्ताभ्यां यत्नतस्ताभ्याम्‌“ (बड़े प्रयत्न से उस हाथी ने अपने समर्थ उन दोनों दतो से) इस उ…
  5. Verse 9हे साधो, कदाचित्‌ शस्त्र ओर श्रृंखला बन्धन का भेदन सहज में हो सकता हे, परन्तु भोगों की आश…
  6. Verses 10–16“स पतन्यादपद्माभ्यामप्राप्य करिणः शिरः“ (गिर रहा वह अपने चरण-कमलों से हाथी का सिर न प्राप…
  7. Verse 17"स खातवलयं वक्रे“ (उस महावत ने गोल गड्ढे का निर्माण किया) इस उक्ति का तात्पर्य कहते हैं ।…
  8. Verses 18–19"परया राजसामग्रया गजलम्पटभूमया' इससे सूचित अनेक गजलम्पट जनों में युक्त उत्तम राजसामग्री क…
  9. Verse 20*उपर्यस्थगयद्‌बाललतौघेन स तं शठः“ (उस कवक महावत ने उस गड्ढे को कोमल बाललताओं से उस प्रकार…
  10. Verse 21इति भूयो दढ बद्धस्तेन हस्तिपकेन सः । तिष्ठत्यद्यापि दुःखेन भूसद्मनि यथा बलि ॥” (इस रीति स…
  11. Verse 22विन्ध्याचल है यह महीतल | इस तरह आपका वृत्तान्त मैंने हाथी के आख्यान द्वारा कह दिया । इसे…