Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, Verses 10–16
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, verses 10–16 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 10-16
संस्कृत श्लोक
यदिभे पाटयत्युच्चैर्बन्धं हस्तिपकोऽपतत् ।
त्वयि त्यजति तद्राज्यमज्ञानं पतितं कृतम् ॥ १० ॥
यदा विरक्तः पुरुषो भोगाशां त्यक्तुमिच्छति ।
तदा प्रकम्पतेऽज्ञानं छेद्ये वृक्षे पिशाचवत् ॥ ११ ॥
यदा विवेकी पुरुषो भोगान्संत्यज्य तिष्ठति ।
तदा पलायतेऽज्ञानं छिन्ने वृक्षे पिशाचवत् ॥ १२ ॥
भोगौघे नूनमुन्मुक्ते पतत्यज्ञानसंस्थितिः ।
पादपे क्रकचच्छिन्ने कुलायस्तद्गतो यथा ॥ १३ ॥
यदा वनं प्रयातस्त्वं तदाऽज्ञानं क्षतं त्वया ।
पतितं सन्न निहतं मनस्त्यागमहासिना ॥ १४ ॥
तेन भूयः समुत्थाय स्मृत्वा परिभवं कृतम् ।
तपःप्रपञ्चखातेऽस्मिन्गहने त्वं नियोजितः ॥ १५ ॥
तदैवाघातयिष्यस्त्वं यद्यज्ञानं तथागतम् ।
राज्यत्यागविधौ तत्त्वां नाहनिष्यत्क्षयं गतम् ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
“स पतन्यादपद्माभ्यामप्राप्य करिणः शिरः“ (गिर रहा वह अपने चरण-कमलों से हाथी का सिर न
प्राप्त कर) इससे जो कहा गया है वह भी अज्ञान मे दिखलाते है।
(79) यह अज्ञान में चेतनत्व का आरोप करके कहा है ।
हाथी के दृढ़ बन्धन तोड़ देने पर जो महावत गिर पड़ा था वह आपके राज्य छोड़ देने पर अज्ञान ही
गिराया गया था । जब विरक्त पुरुष भोगों की आशा छोड़ देना चाहता है तब अज्ञान, काटे जा रहे वृक्ष
के ऊपर रहने वाले पिशाच की नाई, खूब कोपने लगता है । जब विवेकी पुरुष भोगों का बिलकुल त्याग
कर बैठ जाता है तब अज्ञान, वृक्ष कट जाने पर पिशाच की नाई, भाग जाता है। भोगसमूह के उन्मुक्त
होने पर अज्ञान की संस्थिति वैसे गिर जाती हैं, जैसे वृक्ष के आरे से कट जाने पर उसके ऊपर बना
हुआ चिड़ियों का घोंसला । जिस समय आप जंगल को चले, उसी समय आपने अज्ञान को घायल कर
दिया, लेकिन घायल होकर गिरे हुए उसको आपने तत्त्वज्ञान के द्वारा मन के त्यागरूप महा खड्ग से मार
नहीं डाला। तात्पर्य यह है कि उसी समय आपको चूडाला के उक्तिश्रवण के बाद तत्त्वज्ञान के लिए एक
बहुत सुन्दर अवसर मिला था, लेकिन आपने उसे खो दिया | यही कारण है कि उस अज्ञान ने फिर
उठकर आपके द्वारा की गयी अपनी पराजय का स्मरण करके इस तपःप्रपंचरूपी (विस्तृत तपरूपी)
गहन गड्ढे में आपको ढकेल दिया है । राज्य का त्याग करते समय ही घायल होकर गिरे हुए अज्ञान को
यदि आपने जान से मार दिया होता, तो उसी समय बिलकुल नष्ट हुआ वह अज्ञान आपको यों तपरूपी
गड्डे में ढकेलकर नहीं मारता