Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, Verses 18–19
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, verses 18–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 18,19
संस्कृत श्लोक
या तस्य राजराजश्रीर्गजारेर्नृपसत्तम ।
सा त्ववज्ञाननृपतेश्चिन्ताभ्यन्तरचारिणी ॥ १८ ॥
त्वं गजेन्द्रस्त्वयं साधो दीर्घे वनेऽगजोऽपि सन् ।
अज्ञानवैरिणा तेन निक्षिप्तस्तरसामितः ॥ १९ ॥
हिन्दी अर्थ
"परया राजसामग्रया गजलम्पटभूमया' इससे सूचित अनेक गजलम्पट जनों में युक्त उत्तम
राजसामग्री को स्पष्ट रूप से बतलाते हैं।
हे श्रेष्ठ राजन्, जो उस हाथी के शत्रु की उत्तम राजसामग्री है, वह अज्ञानरूपी राजा की अन्तःकरण
में चारों ओर घूमनेवाली चिन्ता है और वह राजा हैं आप। हे साधो, गज न होते हुए भी आप उक्त विवेक
से सम्पन्न गजेन्द्र हैं। इस दीर्घ जंगल में इस अज्ञानरूपी शत्रु महावत ने आपको तपरूपी गड्ढे में बहुत
शीघ्र फेंक दिया हे