Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, Verse 21
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 91, verse 21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 91 · श्लोक 21
संस्कृत श्लोक
इत्यद्यापि तपःखाते दुःखे ह्यस्मिन्सुदारुणे ।
स्थितोऽसि पातालतले नृप बद्धो यथा बलिः ॥ २१ ॥
हिन्दी अर्थ
इति भूयो दढ बद्धस्तेन हस्तिपकेन सः । तिष्ठत्यद्यापि दुःखेन भूसद्मनि यथा बलि ॥” (इस रीति
से पुनः उस महावत ने उस हाथी को सुद्दृढ़रूप से बाँध दिया, जो आज भी बलि के सदृश भूयर्भ में
अवस्थित है) इस उपसंहार का तात्पर्य कहते हुए उपसंहार करते है।
हे नृप, इस तरह आज भी अतिदारुण और दुःखदायक तपरूपी खन्दक में आप ऐसे बधे हुए
अवस्थित हैं, जैसे पातालतल में राजा बलि