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Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 5

चौथा सर्ग समाप्त 4 च पॉँचवाँ सर्ग मोक्षात्मक उत्तम सुख में विश्रान्ति प्राप्त कर लेनेवाले प्रबुद्ध श्रीरामचन्द्रजी का गुरु महाराज के सामने सविस्तार अपने अनुभव का वर्णन ।

16 verse-groups

  1. Verse 1श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, आपके द्वारा उपदिष्ट वाक्यों के अनुसन्धान से मैने चैतन्यर…
  2. Verse 2जैसे चिरकाल से चले आ रहे वषप्रितिबन्ध से (ग्रीष्मादि से) सन्तप्त भूमितल वृष्टि से शान्त ह…
  3. Verse 3भगवन्‌, मैं अब एकमात्र उत्तम शान्ति का अनुभव कर रहा हूँ ओर शान्त आनन्दित होकर सुखपूर्वक स…
  4. Verse 4हे मुने, अब मुझे कुहरे से शून्य दिशाओं के मंडल की नाई भली प्रकार प्रसन्न यह समस्त जगत यथा…
  5. Verse 5भगवन्‌, मैं सन्देह से निर्मुक्त हो गया हूँ, मेरी आशारूप मृगतष्णा विलीन हो गई है, विषयसंसर…
  6. Verse 6हे नाथ, मैं अपने आप से ही अविनाशी उस आनन्द को प्राप्त हुआ हूँ, जहाँ पर अमृत का रसास्वाद भ…
  7. Verse 7आज मैं अपने पारमार्थिक स्वभाव में स्थित हूँ, स्वस्थ हूँ, प्रसन्न हूँ, लोक जहाँ विश्रान्ति…
  8. Verse 8भगवन, मेरे वे संशय, वे सब कल्पनाएँ (भ्रान्तियाँ) उस प्रकार नष्ट हो गई, जिस प्रकार रात्रि…
  9. Verse 9हृदय के निर्मल, विस्तीर्ण ओर हिम की नाई शीतल हो जाने पर, शरतकाल में महान सरोवर के सदुश, म…
  10. Verse 10चिदेकरस आत्मा में अज्ञान आदि कलंक किस निमित्त से आये, वे स्वप्रकाश आत्मा में किस तरह रह स…
  11. Verse 11सदा स्फुरणाकार आत्मा ही सर्वत्र विद्यमान है, सव कुछ इस प्रकार के आत्मा का ही स्वरूपभूत है…
  12. Verse 12भगवन्‌, अब ज्ञानी होकर मैं अनुभूयमान सर्वधर्मातीत आत्मा को ही छोडकर दूसरा पहले उस प्रकार…
  13. Verse 13अहा ! आपके अमृतप्रवाहो से स्नान किया यह मैं परमार्थरूप से जिस प्रकार का था, वह सब मैं ही…
  14. Verse 14अहो, मैं यहीं रहकर किसी अपरिच्छिन्न ब्रह्मलोक की भूमि पर अधिरूढ हो गया हूँ जहाँ पर सूर्य…
  15. Verse 15सन्मात्ररूप ब्रह्म को प्राप्त कर चुका हूँ, चूँकि मैं अपने आपसे अपनी महिमा में सबसे बढ़-चढ…
  16. Verse 16हे स्वामिन्‌, अपने हृदयकमल के कोश में भ्रमरवत सुस्थिर हुए आपके सुन्दर विस्पष्ट वचनामृतों…